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Monday, August 31, 2020

दोष सिद्ध ना हो तब तक हम किसी को दोषी नही ठहरा सकते ................

देवेश प्रताप सिंह राठौर 

(वरिष्ठ पत्रकार)

....... कानून अपना काम करता है कहानी ही किसी को दोषी और दोष को ठेराता है लेकिन जब किसी व्यक्त की  कस्टडी में आरोपी को भी कुछ अधिकार दिए गए हैं, जिनका वह इस्तेमाल कर सकता है।गिरफ्तार करने के दौरान व्यक्ति को उसका अपराध और गिरफ्तारी का आधार बताया जाना चाहिए। उसे यह बताया जाना चाहिए कि उसे जमानत पर छोड़ा जा सकता है या नहीं। गिरफ्तारी के समय व्यक्ति पुलिस से वकील की मदद लेने की इज़ाजत भी मांग सकता है। उसके मित्र संबंधी भी थाने तक जा सकते हैं। अगर आरोपी व्यक्ति गिरफ्तारी का विरोध नहीं कर रहा हो तो पुलिस उसके साथ दुर्व्यवहार नहीं कर सकती और ही मारपीट कर सकती है। अगर वह व्यक्ति पुराना अपराधी नहीं है या उसको हथकड़ी लगाने पर भाग जाने का खतरा नहीं है तो गिरफ्तार व्यक्ति को हथकड़ी नहीं लगानी चाहिए।अगर आरोपी महिला है तो उसे गिरफ्तार करते समय महिला पुलिस भी होनी चाहिए। पुरुष सिपाही उसे छू भी नहीं सकता। गिरफ्तारी के बाद व्यक्ति को तुरंत थाना प्रभारी अथवा मजिस्ट्रेट के पास लाया जाना


चाहिए। उसे 24 घंटे में मजिस्ट्रेट के समक्ष पेशी जरूरी है। अगर हिरासत में कोई पुलिसकर्मी सताता या यातना देता है तो वह व्यक्ति उसकी पहचान कर आपराधिक आरोप दर्ज करा सकता है। अगर हिरासत में महिला के साथ दुष्कर्म या दुर्व्यवहार होता है तो उसे तुरंत डॉक्टर से जांच की मांग करनी चाहिए।गिरफ्तार व्यक्ति को यह अधिकार है कि वह अपनी गिरफ्तारी की सूचना अपने मित्र या परिवार को दे सके। पुलिस इसमें मदद करे। पुलिस की डायरी में गिरफ्तार किए गए व्यक्ति का नाम दर्ज होना चाहिए। उदाहरण के तौर पर सर्वोच्च न्यायालय ने वीके बासू बनाम प. बंगाल राज्य मामले में बड़े अहम निर्देश दिए। जब पुलिस गिरफ्तार व्यक्ति से पूछताछ कर रही हो तो उसके नाम की पट्‌टी, पद स्पष्ट रूप से व्यक्ति को दिखाई देने चाहिए। जब गिरफ्तार व्यक्ति के बारे में सूचना का ‘मेमो’ तैयार कर लिया गया हो तो कम से कम एक गवाह जो कि उसके परिवार का व्यक्ति हो या उस क्षेत्र का जाना-माना व्यक्ति हो, के हस्ताक्षर हों। उस पर गिरफ्तार व्यक्ति के भी हस्ताक्षर होना जरूरी है। पूछताछ करने वाले अधिकारी के हस्ताक्षर भी होने चाहिए और गिरफ्तार व्यक्ति को उसकी एक प्रति मिलना चाहिए। प्रत्येक 48 घंटे में डॉक्टरों का पैनल गिरफ्तार व्यक्ति की मेडिकल जांच करे। प्रत्येक दस्तावेज या मेमो को मजिस्ट्रेट को रेकॉर्ड स्वरूप भेजा जाना चाहिए। 12 घंटे में जिले के पुलिस कंट्रोल रूम को गिरफ्तार व्यक्ति के बारे में सूचना देनी चाहिए। इन निर्देशों का अगर पुलिस पालन नहीं करती है तो संबंधित लोगों पर विभागीय कार्यवाही हो सकती है और उनको कोर्ट की अवमानना का दोषी भी ठहराया जा सकता है। पुलिस किसी को केवल शिकायत या शक के आधार पर गिरफ्तार नहीं कर सकती।

आरोपी या गिरफ्तार व्यक्ति के बारे में अन्वेषण 24 घंटे में अगर पूरा नहीं किया जा सकता है तो इसका पुख्ता कारण कोई पुलिस उपनिरीक्षक के स्तर का अधिकारी निकटतम न्यायिक मजिस्ट्रेट को विहित डायरी में संबंधित प्रविष्टियों की एक प्रति भेजेगा और आरोपी को मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करेगा। सीआरपीसी में अधिकतम रिमांड 15 दिनों के लिए मजिस्ट्रेट की अनुमति से मिल सकती है।

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