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Thursday, August 27, 2020

कोरोना की भेंट चढ़ गई मोहर्रम की सात तारीख

न जुलूस, न दुकानों के लगने से गरीबों की छिनी रोजी 

शिया समुदाय ने घर के अंदर पलंग के सामने की सीनाजनी 

फतेहपुर, शमशाद खान । मोहर्रम की सात तारीख इस्लाम धर्म में बेहद श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। इस तारीख को हजरत इमाम हुसैन के भतीजे हजरत कासिम अ0सल0 ने यजीदी फौज से लड़ते हुए सत्य के लिए अपने को कुर्बान कर दिया था। इसी सिलसिले के चलते सात मोहर्रम को हजरत कासिम अ0स0 का पलंग रूपी जुलूस निकाला जाता है। जहां लोग अकीदत पेश करते हैं लेकिन इस बार कोरोना ने पूरे मोहर्रम को अपनी चपेट में ले लिया। जिसके चलते न तो कोई जुलूस निकला और न ही दुकानें लगीं। जिसके चलते मोहर्रम के दस दिनों तक रोजी-रोटी कमाने वालों के सामने आर्थिक संकट का और भी पहाड़ टूट पड़ा। उधर पाबंदियों के बीच सैय्यदवाड़ा मुहल्ला स्थित मुसद्दक हुसैन की पलंग घर के इमामबाड़े पर रखी गयी थी। जहां पर शिया समुदाय की महिलाओं ने लब्बैक या हुसैन सदाओं के बीच नौहा ख्वानी करते हुए मातम किया। शहर के अन्य स्थानों पर न तो ताजिया रूपी पलंग बिनी गयी और न ही इमामबाड़े पर जियारत के लिए रखी गयीं। 

पलंग पर जियारत करतीं शिया समुदाय की महिलाएं।

बताते चलें कि जिले का मोहर्रम पूरे देश में अपनी अलग पहचान रखता है। नौकरी पेशा से लेकर कारोबारी अपने-अपने रोजी कमाने वाले स्थानों से अपने वतन मोहर्रम में लौट आते हैं और तीजा के बाद वापसी होती है लेकिन इस बार कोरोना के कहर के चलते सरकार ने मोहर्रम के जुलूस पर पाबंदी लगा दी थी। इतना ही नहीं सिर्फ पांच लोगों के इकट्ठा होने की अनुमति दी थी। लेकिन यह मोहर्रम के ताजिया को लेकर नामुमकिन है कि ताजिया उठें और अकीदतमंद शहीदाने कर्बला को खेराज-ए-अकीदत के साथ-साथ फातिहा न करायें। विदित रहे कि मोहर्रम की सात तारीख को शहर के अमरजई व सैय्यदवाड़ा मुहल्ले से दो पलंग के जुलूस कुल मिलाकर तीन जुलूस निकाले जाते हैं। जुलूस निकाले जाने से पहले सुबह से ही इन इमामबाड़ों पर अकीदतमंदों की भीड़ उमड़ पड़ती है। इसके अलावा फातिहा ख्वानी का सिलसिला देर रात तक जारी रहता है। पाबंदियों पर अमल करते हुए इन ताजियों के अलंबरदारांे ने अपने-अपने ताजियों को घर के अंदर ही रखा। जहां पर इक्का-दुक्का महिलाएं ही पहुंच सकीं। सैय्यदवाड़ा मुहल्ले के मुसद्दक हुसैन की पलंग के प्रति शिया समुदाय के लोगों की आस्था है। इसी इमामबाड़े पर शिया समुदाय की महिलाएं व पुरूष इक्का-दुक्का की तादाद में पहुंचे और शहीदान-ए-कर्बला को खेराज-ए-अकीदत पेश की। तत्पश्चात महिलाओं ने नौहा ख्वानी के बीच मातम भी किया। इस बार न तो किसी इमामबाड़े पर पुलिस का अदना सा जवान दिखाई दिया और न ही प्रशासन का कोई अधिकारी दिखा। सबसे ज्यादा नुकसान ऐसे लोगों को हुआ जो मोहर्रम के जुलूस के दौरान गुब्बारा, खुटिया, कलावा सहित अन्य खाद्य सामग्री को बेंचकर कम से कम डेढ़-दो माह के राशन पानी का इंतेजाम कर लेते थे लेकिन शासन के फरमान के चलते ऐसे लोग बेचारे अपने घरों पर ही दुबके रहे। 


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