उचित जल निकास एवं खरपतवार प्रबंधन से उत्पादन में बृद्धि सम्भव - Amja Bharat

Amja Bharat

All Media and Journalist Association

Breaking

Post Top Ad

Responsive Ads Here

Saturday, August 8, 2020

उचित जल निकास एवं खरपतवार प्रबंधन से उत्पादन में बृद्धि सम्भव

कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को दी सलाह 

बांदा, के एस दुबे । कृषि उत्पादन में मौसम की मुख्य भूमिका होती है। कृषि उत्पादन की सफलता सामन्य मानसून एवं अनुकूल मौसम पर निर्भरी करती है। बीजों के अंकुरण से लेकर पकने तक एक उपयुक्त मौसम की जरूरत पड़ती है जो कम से कम एक निश्चित अवधि तक होनी चाहिए। इस मौसम में बोई गई फसलों को विशेष रखरखाव की जरूरत होती है। अधिक वर्षा की दशा में उपयुक्त जल निकास की व्यवस्था करनी चाहिए। बुवाई के प्रथम एक माह तक खरपतवार का उपयुक्त प्रबंधन करना चाहिए। खाद एवं उर्वरक प्रबन्धन भी जरूरी है। बुन्देलखण्ड की मृदाओं को आर्गनिक कार्बन (जीवांश पदार्थ) न्यूनतम है अतः 2 टन प्रति हेक्टेयर वर्मी कम्पोस्ट अथवा 5 टन प्रति हेक्टयर की दर से एफवाईएम का प्रयोग बुवाई से कम से कम एक सप्ताह (7 दिन) पहले करें। मृदाओं में उपलब्ध फास्फोरस भी बहुत कम है। अतः बुवाई के समय फास्फेटिक उर्वरक का प्रयोग करने से दलहन फसलों की जड़ों में गांठो का विकास अच्छा होता है। जिससे फसल की उपज व भूमि की उर्वरा शक्ति में वृद्धि होती है।

खड़ी फसल मंे दीमक के नियंत्रण हेतु सिंचाई के पानी के साथ क्लोरपाइरीफास 20 प्रतिशत ई0सी0 की 2.5 लीटर मात्रा को प्रति हे0 की दर से प्रयोग करना चाहिये। धान में पत्ती लपेटक के नियंत्रण हेतु खेत की निगरानी कर प्राकृतिक शत्रुओं (परभक्षी) का फसल वातावरण में सरंक्षण करें। क्यूनालफास 25 प्रतिशत ई0सी0 1.25 ली0 प्रति0 हे0 की दर से छिड़काव करें। हरा फुदका के नियंत्रण हेतु कार्बोफ्यूरान 3 जी 20 किग्रा0 प्रति हे0 की दर से बुरकाव करें। भूरा फुदका के नियंत्रण हेतु यदि सम्भव हो तो खेत से पानी निकाल देना चाहिए व यूरिया की टाप ड्रेसिंग रोक देनी चाहिए। नीम तेल / 5 मिली प्रति ली के घोल का छिड़काव करें अथवा बुप्रोफेजिन 25 प्रतिशत एस0सी0 1-2 मिली0 प्रति लीटर पानी मे घोलकर आवश्यकतानुसार छिड़काव करें। बैगन की फसल मंे कलंगी एवं फल बेधक कीट के नियंत्रण हेतु 10 मीटर के अन्तराल पर प्रति हेक्टेयर में 100 फेरोमोन ट्रेप लगाकर वयस्क नर कीट पकड़ कर नष्ट कर देना चाहिए। सब्जियों में कीटों के नियंत्रण हेतु  नीम गिरी 4 प्रतिशत (40 ग्रा0 नीम गिरी का चूर्ण 1 ली0 पानी में) का घोल बनाकर 10 दिन के अन्तराल पर छिड़काव करना चाहिए। इस समय रोपित की जाने वाली सब्जियों जैसे टमाटर, बैगन मिर्च आदि की पौध को रोपड़ से पूर्व जड़ गलन, झुलसा व अन्य मृदा जनित रोगों के नियंत्रण हेतु पौध की जड़ो को कार्बेन्डाजिम 01 ग्राम प्रति ली0 पानी के घोल अथवा जैव कवकनाशी ट्राइकोडरमा 05 ग्राम प्रति लीटर पानी के घोल मे 30 मिनट तक उपचारित करना चाहिए। अदरक व हल्दी  की  फसल में प्रकन्द सड़न रोग के लक्षण दिखाई देने पर खेत में जल निकास की समुचित व्यवस्था करें। पशुपालन में पशु बाडे एवं उनके रहने के स्थान पर विशेष ध्यान रखना चाहियें। वर्तमान में नमी एवं जल जमाव वाले जगहों पर पशु न बैठे इसके लिये ध्यान रखना आवश्यक है। मुर्गी पालन में मुर्गियों के रखने के स्थान पर नमी बढ़ने से कई संक्रामक बीमारियां बढ़ती हैं जिसकी रोकथाम हेतु नमी को दूर करने का प्रबंध मुर्गी शेड में करना चाहिए। औद्याननिकी व वानिकी महत्व के पौधे जिन्हे जून / जुलाई माह में रोपित किये गये थे अगर मृत हो गए हैं, तो उस जगह पर स्वस्थ पौधों से प्रत्यारोपित करें। रोपित पौधें के थालों में निराई गुड़ाई करें तथा साथ ही साथ उजागर जड़ों को पुनः मिट्टी से आच्छादित करें। अगस्त माह में प्रायः एक दो अच्छी बारिश होती है तथा वातावरण में नमी की मात्रा काफी होती है, यह समय किन्नू, माल्टा, अमरूद तथा पपीता जैसे फलवृक्ष लगाने का उत्तम समय है। परन्तु ध्यान रहे कि फल पौध उत्तम दर्जे की हों। पौधों को निर्धारित स्थान पर उतना ही गाड़े जितना वे नर्सरी में थे। पौधों की देख-रेख अच्छी प्रकार से करें। मूलवृन्त पर अये फुटान को हटा दें तथा पौधों को सीधा रखने के लिए बनछटी का प्रयोग करें। नियमित सिंचाई करें। किन्तु पौधो के पास अधिक पानी न लगने दें। 


No comments:

Post a Comment

Post Bottom Ad

Pages