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Friday, August 28, 2020

दास्तान-ए-कर्बला ’न की यजीद की बैअत कटा दिया सर को‘

इतिहास के पन्नों में मोहर्रम की नौ तारीख

फतेहपुर, शमशाद खान । कर्बला के इतिहास में नौ मोहर्रम का दिन एवं दस मोहर्रम की रात (शबे आशूर) बहुत महत्वपूर्ण है। कू्रर एवं अधर्मी यजीद पैगम्बर साहब के नवासे की बैअत लेने हेतु अपने सभी अत्याचारी प्रयत्न करता रहा और इमाम हुसैन बराबर किसी अत्याचार की परवाह न करते हुए इनकार करते रहे और शांति का प्रस्ताव रखते रहे। इमाम ने अंत में यह प्रस्ताव रखा कि यदि यजीद उनसे किसी प्रकार का खतरा महसूस कर रहा है तो यह घेराबंदी हटा लें, जिससे यह यजीद की सीमा से बाहर भारत चले जायें। यह प्रस्ताव यजीद के महा सेनानायक उमर इब्ने साद ने गवरनर कूफा इबने जाद के पास भेजा। इबने जाद ने इसका जवाब यह दिया कि उसे हुसैन से या तो बैअत चाहिये अथवा उनका सर। यादि इबने साद यह काम नहीं कर सकता तो वह सेना की बागडोर शिम्र को देकर अपना पद त्याग दे। यह सुनकर इबने जाद ने हुसैन के खेमे की ओर अपनी सेना को मार्च करने का हुक्म दिया यह देख कर इमाम हुसैन (अ,) ने अपने भाई हजरत अब्बास से कहा कि यजीद की फौज से जाकर एक रात की मोहलत ले लो ताकि यह जीवन की अंतिम रात को खुदा की बंदगी में गुजार दी जाये। एक रात


की मोहलत प्राप्त होने के बाद इमाम हुसैन ने अपने सभी साथियों को एक जगह एकत्रित करके निम्न लिखित भाषण दिया फौजे यजीद मुझसे बैअत (यजीद की तावेदारी) चाहती है जो मुझे मंजूर नही है मेरी नजर में जिल्लत की जिन्दगी से इज्जत की मौत अच्छी है। मै हरगिज कू्रर निर्दयी, अधर्मी यजीद की बैअत नहीं करूंगा। यजीद की फौज बैअत से इंकार के कारण मेरे खून की प्यासी हैं उसे तुम लोगों से कोई मतलब नहीं है। तुम लोग जिस ओर जाना चाहते हो चले जाओ। मैं नहीं चाहता कि मेरे कारण तुम लोग कतल कर दिये जाओ। यदि तुम लोगों को मुझे छोड़ कर जाने में शर्म आती है तो मै चिराग बुझाये देता हूं। तुम लोग अंधेरे मे ंचले जाओ। यह कहकर इमाम हुसैन को छोड़कर जाने को तैयार नहीं हुआ और यह जवाब दियास कि यदि हम आपको दुश्मनों में छोड़ कर चले जायेंगे तो हथ के दिन आपके नाना पेगम्बर साहब को क्या जवाब देंगे। यदि हम लोग सत्तर बार भी मर कर दुबारा जिन्दा किये जायें तब भी आपका साथ न छोड़ेंगे। इस पर इमाम ने यह आश्वासन भी दिया कि हथ में में तुम लोगो ंकी शिफाअत (मुफ्ति) का जिम्मेदार हूं। इसपर भी कोई व्यक्ति इमाम को छोड़ कर जाने को तैयार नहीं हुआ तो आपने अपने साथियों की तारीफ की वगर्व से कहा कि जैसे मदद करने वाले मुझे मिलें। न मेरे नाना को मिले, न मेर पिता को मिले और न मेरे भाई को मिले। इसके बाद इमाम हुसैन (अ0) एवं उनके परिवार व साथियों ने अंतिम दिन रात खुदा की उपासना व दुआ व यादें इलाही में व्यतीत की। 


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