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Friday, August 28, 2020

लक्ष्मीकांत वाजपेई के वनवास पर सवालों में है भाजपा नेतृत्व!

पार्टी के ब्राह्मण नेता पर क्यों जड़े हैं मोदी व शाह की जुबां पर ताले?

2014 के खेवनहार पर क्या भारी पड़ रही है बड़ों से रार ?

उपेक्षा पर सुलग रहे हैं कई भाजपाइयों के दिल !

लखनऊ, संजय सक्सेना -  प्रदेश के पूर्व भाजपा अध्यक्ष तेज तर्रार ब्राह्मण नेता लक्ष्मीकांत बाजपेई पर पूरी भाजपा शांत है! क्या कारण है कि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं गृहमंत्री अमित शाह की जुबां पर श्री बाजपेई के नाम पर ताले जड़े हुए हैं? फिलहाल पूर्व अध्यक्ष की लगातार हो रही उपेक्षा पर कई भाजपाइयों के दिल सुलग रहे हैं जबकि भाजपा नेतृत्व कई दलबदलूओ को पार्टी में शामिल कर उनकी आरती उतार रहा है। ऐसे में एक ब्राह्मण नेता को शून्य के घेरे में घेरकर नेतृत्व द्वारा बनवास दे देना कई सवालों को जन्म तो दे ही रहा है? लगभग 44 माह तक भाजपा उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष रहे पंडित लक्ष्मीकांत बाजपेई आज कतिपय कारणों से बनवास भोग रहे हैं। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में खेवनहार की भूमिका निभाने वाले इस नेता पर आज पूरी भाजपा शांत बनी हुई है। यही नहीं देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं गृह मंत्री अमित शाह की नज़र भी इस ब्राह्मण नेता पर अब तक नहीं पहुंची है, जबकि केंद्र की मोदी सरकार का एक कार्यकाल भी बीत चुका है। 


मेरठ शहर की विधानसभा से कई बार विधायक होने वाले लक्ष्मीकांत बाजपेई तेजतर्रार एवं स्पष्ट वक्ता के रूप में जाने जाते हैं। जिस समय वे प्रदेश अध्यक्ष बने थे उस समय प्रदेश की भाजपा गुटबाजी का शिकार थी, लेकिन श्री बाजपेई ने एक अच्छे संगठक की तरह कार्यकर्ताओं में जोश भरा। भाजपा कार्यकर्ता जागरूक हो उठा।फिर जागरूक कार्यकर्ताओं ने मोदी के नाम पर भाजपा को केंद्र की सत्ता में ला दिया ।आशा थी कि लक्ष्मीकांत बाजपेई को इसका इनाम मिलेगा, परंतु ऐसा नहीं हो सका। उन्हें प्रदेश अध्यक्ष पद से छुट्टी दे दी गई। इसके बाद वह दिन था और आज का दिन है भाजपा नेतृत्व ने इस बड़े नेता की ओर झांका भी नहीं। भाजपा कार्यकर्ता भी यह समझ नहीं पा रहे हैं कि क्या कारण है कि पार्टी नेतृत्व जानबूझकर लक्ष्मीकांत बाजपेई जैसे बड़े नेता को दरकिनार कर रहा है? सूत्रों का दावा है कि साफ-साफ मुंह पर बोलने एवं चापलूसी से दूर रहने की आदत के चलते पूर्व प्रदेश अध्यक्ष का संभवत यह हाल है! पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बड़े नेताओं में शुमार लक्ष्मीकांत बाजपेई अपनी गरजदार आवाज से शांत समंदर में तूफान ला देते थे ! वह विरोधियों पर भी बरसते थे तो वहीं अपने कार्यकर्ताओं के लिए कुछ भी करने को आतुर रहते हैं। सादगी पसंद इस ब्राह्मण नेता को भाजपा नेतृत्व के द्वारा न तो सरकार में और ना ही संगठन में अब तक कोई तवज्जो दी गई है। इसकी कहीं आशा भी नजर नहीं आती! विश्वस्त सूत्रों का दावा है कि कुछ ऐसे अज्ञात कारण जरूर होंगे कि इस नेता को सुनियोजित व्यवस्था के तहत संभवत दबाकर रखा जा रहा है।

भाजपा में भी इस समय दूसरे दलों से आने वाले दलबदलूओं की भर्ती जारी है! जिसे देख समर्पित भाजपाई सांसत में है। कई दूसरे दलों से आने वाले नेताओं को राज्यसभा का टिकट दे दिया गया है। कई राज्यसभा पहुंच चुके हैं। कई उत्तर प्रदेश की सरकार में मंत्री हैं। कई दलबदलू अभी भाजपाई होने वाले हैं। भाजपा में इन गैर वैचारिक मत के नेताओं का स्वागत थाल लेकर किया जा रहा है? यही नहीं लोकसभा चुनाव के दौरान भी ऐसे कई लोगों को टिकट दिया गया । आज वह माननीय सांसद बने बैठे हैं। ऐसे में लक्ष्मीकांत बाजपेई  जैसे पूर्णकालिक कार्यकर्ता को फूटी आंखों ना देखना यही दर्शाता है कि कहीं न कहीं भाजपा नेतृत्व उन्हें पार्टी की मुख्यधारा में लाना ही नहीं चाहता! भाजपा के कई नेता कई प्रदेशों के गवर्नर बन चुके हैं। लेकिन बेचारे बाजपेई नेतृत्व की नजर में इस लायक भी नहीं बचे? भाजपा के दर्जनों कार्यकर्ताओं ने वार्ता के दौरान कहा कि जब बाजपेई जी जैसे समर्पित व्यक्तित्व के साथ आज यह व्यवहार भाजपा की सत्ता के रहते किया जा रहा है। तो आम कार्यकर्ताओं का दूर-दराज इलाकों में क्या हाल है। इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है? सूत्रों के मुताबिक लक्ष्मीकांत बाजपेई शायद भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह एवं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जो मंडली है उसमें फिट नहीं बैठे? उनका हर बात पर मुखर होना भी इस मंडली को नहीं भाया? जमीनी नेतागिरी करने वाले बाजपेई आंख कान बंद करके किसी का भी यशोगान नहीं कर सकते? यह स्थिति भी उनके लिए आज घातक है! साफ बात यह है कि आज पूरी भाजपा संगठन के आसपास भले ही नजर आ रही हो लेकिन भाजपा में व्यक्तिवाद अथवा अधिनायकवाद क़ायम हैं? आज उसी पूजा के चलते लक्ष्मीकांत वाजपेई जैसे नेता किनारे खड़े नजर आ रहे हैं! प्रदेश में बाजपेई के समर्थक अथवा तमाम अन्य समर्पित भाजपाइयों के दिल भी पूर्व भाजपा अध्यक्ष की इस दुर्गति पर सुलग रहे हैं। यह धुआं आगे चलकर कोई चिंगारी बनेगा या आग? यह तो आने वाला समय ही जाने, लेकिन लक्ष्मीकांत वाजपेई के नाम पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं गृह मंत्री अमित शाह तथा भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष की जुबान पर जड़े ताले कोई न कोई सुनियोजित कहानी का संकेत जरूर दे रहे हैं। फिलहाल एक समय भाजपा के प्रदेश में खेवनहार रहे लक्ष्मीकांत बाजपेई को शायद बड़ों से रार भारी पड़ रही है। भाजपाई ब्राह्मण समर्थकों में भी इसे लेकर गुस्सा है। अब भाजपा नेतृत्व पूर्व प्रदेश अध्यक्ष को उपेक्षित रखता है या फिर आगे कहीं उनका एडजेस्टमेंट होता है यह तो आनेवाला समय ही बताएगा, लेकिन यह तय है कि भाजपा में बढ़ते दलबदलूओं के नक्कारों के बीच लक्ष्मीकांत बाजपेई आज तूती की आवाज बनकर रह गए हैं! जो भाजपा के लिए शायद दुर्भाग्य है या फिर समर्पित कार्यकर्ताओं के लिए तो एक बड़ा दुर्भाग्य है ही!

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