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Wednesday, August 26, 2020

1962 के युद्ध में चीन की दोहरी नीति..............

देवेश प्रताप सिंह राठौर 

(वरिष्ठ पत्रकार)

....... भारत में आजादी के बाद बहुत सी लड़ाइयां लड़ी लेकिन उस लड़ाई में एक लड़ाई 1962 के साथ जो चीन के साथ हुई और चीन ने किस तरह गद्दारी का का परिचय प्रस्तुत कर भारत के साथ युद्ध किया भारत युद्ध के लिए तैयार नहीं था उसे नहीं मालूम था कि चीन अचानक हिंदू चीनी भाई भाई कहकर युद्ध कर देगा , भारत की आजादी के मात्र 14या 15 वर्ष ही हुए थे , लेकिन उसके बावजूद भी जिस तरह से भारतीय सेना ने युद्ध में चाइना के हौसले गिराए थे वह चीन अभी तक यह तो समझता है कि भारत के साथ लड़ाई होगी तो वह गंभीर परिणाम चाइना को भुगतने पड़ेंगे यह चीन को बलि बात मालूम है क्योंकि जब 1962 में भारत की चीन से युद्ध हुआ था उसे हम अपनी हार नहीं कह सकते क्योंकि हमारी तैयारी नहीं थी उसके बावजूद भी जिस तरह से दुश्मन का मुकाबला किया वह एक जीत के समान ही भारत के विश्वासी सेना को बहुत बड़ा सम्मानित तरीके से प्रणाम करते हैं।1962 की लड़ाईउसका संचित इतिहास आपको बताना चाहते हैंअपने इतिहास में हिंदुस्तान ने कई लड़ाइयां लड़ी और


लगभग हर बार देश को जीत का गौरव मिला। लेकिन एक युद्ध ऐसा था जो दरअसल युद्ध नहीं छल की दास्तां थी। जब दोस्ती की पीठ पर दगाबाजी का खंजर चलाया जाता है तो उसे 1962 का भारत चीन युद्ध कहते हैं। तब दोस्ती का भरोसा हिंदुस्तान का था, विश्वासघात का खंजर चीन का। उस युद्ध में हार से ज्यादा अपमान का लहू निकला। 1962 के भारत चीन युद्ध को कौन भूल सकता है। 62 कि वह तबाही को कौन भूल सकता है जो चीन ने बरपाई लेकिन उसके साथ ही हिंदुस्तान ने याद रखा एक सबक कि दोबारा 62 जैसी नौबत ना आए। 22 अक्टूबर 1962 को प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू राष्ट्र के नाम संदेश में छल की वह कहानी सुना रहे थे। जिसके वह खुद एक लेखक भी थे, किरदार भी और आखिरकार छल के शिकार भी। साथ ही छला गया था पूरा भारत। महावीर और बुद्ध की शांतिपूर्ण धरती युद्ध भूमि में बदल गयाआज से तकरीबन 58 साल पहले जब आधा हिंदुस्तान सो रहा था उस वक्त विश्वासघात और छल की एक पटकथा लिखी जा रही थी। चीन ने भारत पर सुनियोजित हमला किया। अरुणाचल से लेकर चीन की सेना ने न सिर्फ सीमा रेखा लांघी बल्कि दोस्ती के नाम पर घात भी किया। आजादी के बाद भारत जिस देश को अपना सबसे करीबी मान रहा था उसने ही भारत को युद्ध भूमि में ललकारा था। 1947 में भारत को आजादी मिली और उसके ठीक दो साल बाद यानी 1949 में माओत्से तुंग के नेतृत्व में साम्यवादी दल ने 1 अक्टूबर, 1949 को चीनी लोक गणराज्य (पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना) की स्थापना की। आजादी के बाद से ही दोनों देशों में मित्रता वाले संबंध थे। उस दौर में भारत सरकार शुरू से ही चीन से दोस्ती बढ़ाने की पक्षधर थी। जब चीन दुनिया में अलग-थलग पड़ गया था, उस समय भी भारत चीन के साथ खड़ा था। जापान के साथ किसी वार्ता में भारत सिर्फ इस वजह से शामिल नहीं हुआ क्योंकि चीन आमंत्रित नहीं था। इतिहास के हवाले से कई दावें ऐसे भी हैं कि जवाहर लाल नेहरू की गलती की वजह से भारत ने संयुक्त राष्ट्र के सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता ठुकरा दी और अपनी जगह ये स्थान चीन को दे दिया। उस दौर में आदर्शवाद और नैतिकता का बोझ पंडित नेहरू पर इतना था कि वो चीन को सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता दिलवाने के लिए पूरी दुनिया में लाबिंग करने लगे। लेकिन सरदार पटले ने चीन की चाल को भांप लिया था। वर्ष 1950 में ही सरदार पटेल ने नेहरू को चीन से सावधान रहने के लिए कहा था। अपनी मृत्यु के एक महीने पहले ही 7 नवंबर 1950 को देश के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने चीन के खतरे को लेकर नेहरू को आगाह करते हुए एक चिट्ठी में लिखा था कि भले ही हम चीन को मित्र के तौर पर देखते हैं लेकिन कम्युनिस्ट चीन की अपनी महत्वकांक्षाएं और उद्देश्य हैं। हमें ध्यान रखना चाहिए कि तिब्बत के गायब होने के बाद अब चीन हमारे दरवाजे तक पहुंच गया है। लेकिन अपने अंतरराष्ट्रीय आभामंडल और कूटनीतिक समझ के सामने पंडित नेहरू ने किसी कि भी सलाह को अहमियत नहीं दी। पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने 'हिंदी-चीनी भाई-भाई' का नारा दिया। मगर 1959 में दलाई लामा के भारत में शरण लेने के बाद दोनों देशों के संबंधों में तनाव आने लगा। यही भारत-चीन युद्ध की बड़ी वजह थी1962 में भारत पर चीन ने हमला क्यों किया था और इस युद्ध के पीछे चीन की मंशा क्या थी। इसको लेकर जितने सवाल उतने ही जवाब सामने आते हैं। लेकिन चीन के एक शीर्ष रणनीतिकार वांग जिसी ने इस युद्ध के 50 साल पूरे होने पर साल 2012 में दावा किया था कि चीन के बड़े नेता माओत्से तुंग ने 'ग्रेट लीप फॉरवर्ड' आंदोलन की असफलता के बाद सत्ताधारी कम्युनिस्ट पार्टी पर अपना फिर से नियंत्रण कायम करने के लिए भारत के साथ वर्ष 1962 का युद्ध छेड़ा था। उस समय हिंदी चीनी भाई-भाई नारा छाया रहता था, लेकिन बॉर्डर पर चीन की इस करतूत से हर कोई हैरान था। भारत को कभी यह शक नहीं हुआ कि चीन हमला भी कर सकता है। वांग जिसी ने कहा, ‘स्वाभाविक रूप से उन्होंने (माओत्से) ने कई व्यावहारिक मुद्दों पर से नियंत्रण खो दिया। इसलिए वह यह साबित करना चाहते थे कि वह अभी भी सत्ता में हैं विशेष रूप से सेना का नियंत्रण उनके हाथों में है। इसलिए उन्होंने तिब्बत के कमांडर को बुलाया और झांग से पूछा कि क्या आप इस बात का भरोसा है कि आप भारत के साथ युद्ध जीत सकते हैं.’ झांग गुओहुआ तिब्बत रेजीमेंट के तत्कालीन पीएलए कमांडर थे। वांग जिसी के अनुसार, ‘कमांडर ने कहा, ‘हां माओत्से, हम युद्ध आसानी से जीत सकते हैं। उन्होंने कहा, ‘आगे बढ़ो और इसे अंजाम दो.’ इसका उद्देश्य यह प्रदर्शित करना था कि सेना पर उनका व्यक्तिगत नियंत्रण है। युद्ध के शुरू होने तक भारत को पूरा भरोसा था कि युद्ध शुरू नहीं होगा, इस वजह से भारत की ओर से तैयारी नहीं की गई। यही सोचकर युद्ध क्षेत्र में भारत ने सैनिकों की सिर्फ दो टुकड़ियों को तैनात किया जबकि चीन की वहां तीन रेजिमेंट्स तैनात थीं। चीनी सैनिकों ने भारत के टेलिफोन लाइन को भी काट दिए थे। इससे भारतीय सैनिकों के लिए अपने मुख्यालय से संपर्क करना मुश्किल हो गया था। भारतीय सेना इस हमले के लिए तैयार नहीं थी नतीजा ये हुआ कि चीन के 80 हजार जवानों का मुकाबला करने के लिए भारत की ओर से मैदान में थे 10-20 हजार सैनिक। ये युद्ध पूरा एक महीना चला जब तक कि 21 नवंबर 1962 को चीन ने युद्ध विराम की घोषणा नहीं कर दी। वहीं चीन आज पाकिस्तान नेपाल को भड़का  रहा है। बॉर्डर पर युद्ध जैसे हालात बने हुए हैं मुझे लगता है कि युद्ध होगा चीन सर्दी में कुछ दिक्कत भारत के लिए पैदा करने की सोच बनाए हुए हैं भारतीय सेना भी पूर्ण रुप से तैयार ह भारत के साथ विश्व बहुत से  देश तैैयार बैठे हुए हैं भारत का साथ देने के लिए की चीन शुरुआत तो करें फिर देखिए क्या होगा  जिंदगी भर पनप नहींं पाएगा चीन, जिस तरह से हरकत चीन कर रहा है वह उसके अहंकार ताकत से चीन का अहंकार  जो भारत उसे चकनाचूर करेगा। यह निश्चित है कि चीन को हारना तय है। क्योंकि भारत के साथ बहुत से देश एवं पूरे विश्व मेंआज चीन के कोरोना वायरस संक्रमित जो हुए हैं चाइना से निकला कोरोना वायरस  उससे पूरा देश चीन के खिलाफ एकमत में खड़ा है।

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