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Monday, July 20, 2020

कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य न खोए..............................

देवेश प्रताप सिंह राठौर 
(स्वतंत्र पत्रकार)

आज का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है यह कि विपरीत परिस्थितियों में क्या करें ? जीवन में यदि विपरीत परिस्थितियां आती हैं तो उनमें संतुलन कैसे बनाएं अक्सर लोग जीवन में विपरीत परिस्थितियों से परेशान हो जाते हैं  घबरा जाते हैं। उन्हें रास्ता दिखाई नहीं देता कि अब क्या करें?लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण बात तो यह है, कि जीवन की किसी भी परिस्थिति को हम किस प्रकार लेते हैं? यह सब हमारे ऊपर निर्भर होता है! यदि हम जीवन की विपरीत परिस्थिति को नकारात्मक भाव से लेते हैं, तो वह हमारे जीवन पर नकारात्मक प्रभाव ही डालती है। और यदि किसी नकारात्मक  परिस्थिति को भी हम सकारात्मक भाव से लेते हैं। तो यकीन मानिए वह हमारे जीवन पर सकारात्मक प्रभाव ही डालती है । और यह हमारे जीवन का व्यक्तिगत अनुभव भी है।जीवन की हर परिस्थिति हमारे भाव एवं विचारों पर निर्भर होती है। कि हम उसे अपने जीवन में किस प्रकार लेते हैं। यदि आप जीवन की सुखद परिस्थितियों को भी नकारात्मक भाव से देखते हैं। तो वह आप पर बुरा असर ही डालती हैं। क्योंकि यह सब हमारे दृष्टिकोण पर निर्भर होता है। अब आप लोग सोच रहे होंगे, कि ऐसा कैसे हो सकता है! दुख "सुख "में सुख-"दुख" में परिवर्तित कैसे हो सकता है? तो हम आप लोगों से यही कहेंगे कि जी" हां " ऐसा बिल्कुल हो सकता है । चलिए हम आप लोगों को एक छोटी सी कहानी के माध्यम से समझाते हैं।एक बार एक भिक्षू अपना मार्ग भटक गया, उसे जाना कहीं और था। वह कहीं और पहुंच गया । लेकिन ध्यान दें , यह घटना सिर्फ उस सन्यासी की नहीं है। बल्कि हमारे जीवन पर भी लागू होती है, कि हमें जाना तो कहीं और होता है। लेकिन हम पहुंच कहीं और जाते हैं। कहीं ना कहीं हम सब अपना मार्ग भटक चुके हैं।
वह सन्यासी आधी रात तक भटकता रहा, परंतु उसे उसका गांव नहीं मिला। और गलती से वह किसी दूसरे गांव में पहुंच गया।उसने आधी रात में जाकर एक घर का दरवाजा खटखटाया, दरवाजा खुला लेकिन उस गांव के लोग दुसरे धर्म को मानते थे। और वह भिक्षु दूसरे धर्म का था। उस दरवाजे के मालिक ने दरवाजा बंद कर लिया और कहा-  यह द्वार तुम्हारे लिये नहीं है। हम इस धर्म को नहीं मानते हैं तुम कहीं और खोज कर लो । और उसने चलते वक्त यह भी कहा की इस गांव में शायद ही कोई दरवाजा तुम्हारें लिए खुले।क्योंकि इस गांव के लोग दूसरे ही धर्म को मानते है। और हम तुम्हारे धर्म के दुश्मन है। आप तो जानते ही हैं कि धर्म-धर्म आपस में बडे क्षत्रु है। एक गांव का अलग धर्म हैं, दूसरे गांव का अलग धर्म है। एक धर्म वाले को दसूरे धर्म वाले के यहां कोई जगह नहीं, कोई आशा नहीं, कोई प्रेम नहीं,  सभी द्वार बंद हो जाते है।द्वार बंद हो गये उस गांव में। उसने दो-चार दरवाजे खटखटाये लेकिन दरवाजे बंद हो गये, सर्दी की रात है। अधंरी रात है। लेकिन उन धार्मिक लोगों ने मनुष्यता जैसी कोई बात कभी सोची ही नहीं। वे हमेशा सोचते हैं ,हिन्दु हैं या मुसलमान, बौद्ध हैं या जैन। आदमी का सीधा मूल्य उनकी नजर में कभी नही रहा। उस भिक्षू को वह गांव छोड देना पडा। आधी रात में वह जाकर गांव के बाहर एक पेड़ के नीचे सो गया।कोई दो घंटे बाद ठण्ड के कारण उसकी नींद खुली उसने आंख खोली तो  उपर आसमान तारों से भरा है। उस पेड़ पर फुल खिल गये है। रात के खिलने वाले फुल उनकी सुगंध चारों तरफ फैल रही है। पेड़ के फुल चटख रहे है। आवाज आ रही है और फूल खिलते चले जा रहे है।
वह आधी घडी मौन उस पेड़ के फूलों को खिलते देखता रहा। आकाश के तारों को देखता रहा। फिर दौड़ा गांव की तरफ फिर जाकर उसने उन दरवाजों को खटखटाया ।जिन दरवाजों को उनके मालिकों ने बंद कर लिया था।जब फिर से दरवाजा खटकने की आवाज आई तो लोगों ने सोचा अब आधी रात फिर कौन आ गया ? उन्होंने दरवाजे खोले, तो वह भिक्षु खड़ा है। उन्होंने कहा हमने मना कर दिया यह द्वार तुम्हारें लिये नहीं हैं, फिर दोबारा क्यों आए हो। लेकिन उस भिच्छू के आंखों से कृतज्ञता के आंसु बहे रहे थे । उसने कहा नहीं अब द्वार खुलवाने नहीं आया, अब ठहरने नहीं आया मैं तो केवल आप लोगों को धन्यवाद देने आया हूं।
अगर तुम आज मुझे अपने घर में ठहरा लेते तो रात आकाश के तारे ओर फूलो का चटख कर खिल जाना मैं देखने से वंचित ही रह जाता।मैं जैसी तुमने मुझे एक अनुभव की रात दे दी, जो आनन्द मैंने आज जाना हैं जो फूल मैंने आज खिलते देखे हैं, जैसे मेरे भीतर की आत्मा खिल गई हो। जैसी आज अकेली रात में आकाश के तारे देखे हैं। जैसे मेरे भीतर ही कोई आकाश स्पष्ट हो गया हो।
आज मुझे वह मिल गया जिसके लिए मैं बरसों से इधर-उधर घूम रहा था । आज मेरी प्रतीक्षा पूर्ण हो गई।आज मैं परम आनंदित हूं, और इसका मैं आप लोगों को धन्यवाद देता हूं।इसलिए परिस्थिति कैसी हैं इस पर कुछ निभर नहीं करता। हम परिस्थिति को कैंसे लेते हैं,  सब कुछ इस पर निर्भर करता। अगर आप परिस्थितियों को सकारात्मक भाव से लेते हैं,  तो राह पर पडे हुए पत्थर भी सीढिया बन जाते है। और जब आप परिस्थतियों को नकारात्मक भाव गलत ढंग से लेने के आदि हो जाते हैं ,तो मंदिर की सीढ़िया भी पत्थर मालूम पडने लगती है। जिनसे रास्ता रूकता हैं पत्थर सीढी बन सकते है। और सीढियां पत्थर मालूम हो सकती है ।अवसर दूर्भाग्य मालूम हो सकते है। हम कभी-कभी सोचते हैं कि हमारे साथ अच्छा करने के बाद भी विपरीत प्रभाव क्यों पड़ता है। तो मैंने समझा क्योंकि जहां पर औसत विपरीत भाव के होते हैं वहां सकारात्मक सोच वाला नहीं रह सकता है । क्योंकि आज का समाज घर परिवार हो ऑफिस होअपना व्यापार हो अपनी दुकान हो या कोई भी जगह हो हर जगह कुछ ना कुछ कठिनाइयां  रहती हैं। क्यों रहती हैं क्योंकि वहां पर कुछ नकारात्मक सोच वाले बैठे हैं जो सकारात्मक भाव से काम करने के आदी नहीं है। क्योंकि हर जगह कुछ तत्व ऐसे हैं जो विपरीत परिस्थिति बनाने के और नकारात्मक सोच रखने वाले व्यक्तियों की संख्या अधिक है तथा सकारात्मक सोच रखने वाला व्यक्ति को परेशानी उत्पन्न होती है। परंतु मनुष्य को हर परेशानियों का सामना करते हुए अपने धैर्य को बनाए रखना बहुत ही जरूरी है क्योंकि पूरा माहौल ही जब ऐसा है वहां पर संयम धैर्य से ही कार्य करने की जरूरत है।

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