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आस्था और विश्वास...............

देवेश प्रताप सिंह राठौर ...
(वरिष्ठ पत्रकार)

जीवन का संचालन इन दो शब्दों से पूरा जीवन सिमट कर रह जाता है दोनों का अपना अपना अधिक महत्व है क्योंकि जहां पर विश्वास नहीं होता वहां पर आस्था पर भी विश्वास टूट जाता है समय-समय पर यह दोनों शब्द वक्त पर याद आते हैं जब हमारा सामना किसी ऐसी परेशानियों पर होता है उस वक्त हमें आस्था और विश्वास का एहसास होता है।विश्वास और आस्था दो ऐसे शब्द है, जिनके मायनें शायद एक दूसरे के बिलकुल करीब होते हुये भी अलग अलग हैं। शायद एक जुड़वा की तरह, जिनमें भले ही कितनी भी बाहरी एक रुपता हो लेकिन मन की गहराई से एक नदी के दो किनारे होते हैं, एक साथ चलते हैं, एक दूसरे के नज़दीक रहते हैं, एक दूसरे के बिन अधूरे होते है, सफर टेढ़ा मेढ़ा हो, उतार चढ़ाव भरा हो पर साथ नहीं छोड़ते, एक दूसरे के अनुभवों के गवाह भी बनते हैं, एक है इसीलिए दूसरे का अस्तित्व है लेकिन इतना होते हुये भी कभी आपस में मिलते नहीं।विश्वास का जन्म तो इन्सान की पैदाइश के साथ ही हो जाता है। पैदा होते ही उस नन्हें से बच्चे को पूरा विश्वास होता है कि कोई उसकी रोती हुयी आवाज़ को सुन कर उसे दूध पिलायेगा। अपने स्पर्श से उसे अहसास दिलायेगा कि इस दुनियां में वो महफूज़ है। इन्सान अपना पूरा जीवन विश्वास में ही तो जीता है। अपने हर कदम पर वो विश्वास करता है; कभी अपने जन्म दाता में, कभी इस प्रकृति में, कभी ब्रहम्माड में, अपने हर छोटे और बड़े कर्म में। वो विश्वास करता है
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कि जो भोजन वो खा रहा है, वो ही उसे जीवित रखेगा। वो विश्वास करता है कि जो पानी वो पी रहा है, वो उसकी प्यास बुझायेगा। वो विश्वास करता है कि जिस धरती पर वो चल रहा है, वो उसका बोझ सम्हालेगी। वो विश्वास करता है कि जिस वायु को अपने शरीर में श्वास के माध्यम से खींच रहा है, वो उसे ऊर्जा देगी। दरअसल विश्वास का नाता हमारे रोम-रोम से है। इसके उलट आस्था हमारी पैदाइश के बाद जन्म लेती है। आस्था उत्पन्न नहीं होती बल्कि इसका विकास होता है, हमारे अपने अनुभवों के आधार पर। आस्था हमें विरासत में भी मिलती है। क्योंकि हम अक्सर उसी में आस्था रखते हैं, जिसके बारे में हमारे पुरखे हमें बताते हैं। जन्म से पहले हमारी आस्था का निर्धारण नहीं किया जा सकता। जन्म के बाद आस्था का कुछ हिस्सा हम पर थोपा जाता है, कुछ हम खुद तैयार करते है, जो हमे ठीक लगता है, हमारी अपनी प्रकृति के अनुसार, उसको हम अपना लेते हैं। कह सकते हैं कि विश्वास जीव की मूल प्रकृति है जबकि आस्था उसके संस्कारों का नतीजा होता है।
अब सवाल ये है कि इन दोनों में कौन ज्यादा बलवान है। क्योंकि विश्वास जीव की मूल प्रकृति है इसलिये अगर इसके उलट कोई भी काम किया जायेगा तो वो खुद ब खुद इसके पक्ष में ही हो जायेगा। मसलन अगर आप एक चीज़ में विश्वास न कर दूसरी चीज़ को अपनाते हैं, तो आप दूसरी चीज़ में विश्वास कर लेते हैं। आप अपनी पसन्द तो बदल सकते हैं लेकिन विश्वास करने की प्रकृति नहीं। मगर इन्सान अपनी आस्था से नाता तोड़ सकता है। ये थोपी तो जा सकती है लेकिन मूल प्रकृति में नहीं होती। ये इन्सान के ऊपर है कि वो किसी एक धर्म या ईश्वर मे आस्था रखे, उसे बदल ले या फिर किसी में भी आस्था न रखे।विश्वास कभी ख़त्म नहीं होता फिर भी कमज़ोर होता है, बहुत जल्दी टूट जाता है, महज एक नाकामी इसे चूर-चूर कर देती है। आस्था आत्मा की प्रकृति नहीं होती, हमारे शरीर में जन्म लेती है फिर भी मजबूत होती है, ये जल्दी डिगती नहीं। केदारनाथ में प्रकृति के भयंकर तांडव के बाद भी वहां बचे हुये लोगों की आस्था नहीं डोली। इस विनाश ने शिव के सामनें ही उनसे उनके अपने छीन लिये, वो अकेले हो गये मगर शिव के प्रति उनकी आस्था डोली नहीं। बचने वाले यही कहते रहे कि शिव की अनुकंपा ने बचाया। यहां अगर बात विश्वास की होती तो शायद वो टूट जाता। वैसे कई बार विश्वास करने की मजबूरी भी होती है। अब देखिये केदारनाथ में जिन पत्थरों ने लोगों की जान ली, बचे हुये लोगों को अपनी जान बचानें के लिए उन्हीं पत्थरों पर विश्वास करना पड़ा क्योंकि विश्वास मूल हैं। हम विश्वास को बदलने के लिए फिर विश्वास करते हैं। इन दोनों ही भावनाओं की एक और खूबी ये हैं कि विश्वास अक्सर एक घटना मात्र होता है, जो टूटता तो जल्दी है लेकिन कष्ट ज्यादा नहीं देता, कुछ दिनों में उन ज़ख्मों को इन्सान खुद भर लेता है क्योंकि एक विश्वास टूटता है तो दूसरी वजह उसे फिर मिल जाती है, नये विश्वास के लिए लेकिन अगर आस्था टूट जाये तो मनुष्य की जड़े ही हिला देती है। अपनें अनुभवों के आधार पर इन्सान आस्था का ढांचा खड़ा करता है और अगर एका-एक उसे ये मालुम चले कि जिन स्तम्भ के सहारे वो जीवन जी रहा था, वो उसके व्यक्तित्व पर खरे नहीं हैं, उसका बोझ उठाने लायक नहीं हैं, तो पूरा जीवन ही बिखर जाता है। दूसरी आस्था को खोजने, उसको अनुभव करने और उसे दोबारा तैयार करने की हिम्मत नहीं रहती फिर। अगर जैसे-तैसे वो अपने लिए नई आस्था की राह तैयार भी कर ले, तो उसमें वो आत्मीयता नहीं रहती क्योंकि पहले के ख़त्म होने का दुख कुरेदता रहता है और एक के टूटने के बाद दूसरे पर चलने की ज्यादा वजह इन्सान खोज नहीं पाता। विश्वास अपने रास्ते चलता रहता है और आस्था अपने रास्ते परिपक्व होती रहती है। अगर चन्द शब्दों में समझने की कोशिश करें तो बात समझ में ये आती है कि विश्वास अटल है, मगर कमज़ोर भी और आस्था भंगुर है, मगर फिर भी मजबूत। एक विकसित संस्कृति में रहने वाले मनुष्य के लिए शायद ये जरुरी है कि नदी के ये दो किनारे एक दूसरे के साथ इसी तरह से चलते रहें। न जुदा हो, न ही इनमें से एक अकेला अपने अस्तित्व को सम्हालनें पर मजबूर हो और न ही ये एक दूसरे से मिलें क्योंकि नदियों के दो किनारों के मिलनें का मतलब तो होता है, विस्तार की समाप्ति और इन दोनों के मिलनें का परिणाम क्या होगा, आस्थााा और विश्वास यह कैसा शब्द है जो व्यक्तिि की जीवन का बहुत बड़ा आधार बनता है। क्योंकि बगैर विश्वास के कोई भी व्यक्ति कार्य नहीं कर सकता आज बहुत से लोग विश्वास को तोड़ देते हैं आज शाहीन होते हैं आस्था को नहीं मानते वह लोग अंत में आस्था और विश्वास की ऐसी मजबूरी जब घर परिवार में आती है तब उन्हें जिन लोगों पर विश्वास नहीं होता और आस्था नहींं होती उस वक्त उन्हें आस्था विश्वास पूरा विश्वास होता है। हम छल कपट से किसीी को धोखा दे सकते हैं और उसके विश्वास को हम तोड़ देते हैं पूरा जीवन तपस्या है तब कहीं एक विश्वास और ईश्वर के प्रति आस्था जब इंसााान समाज लेता है।  तब उसे एहसास होता है अपनेे अतीत की और देखता है। उस समय आस्था और विश्वास का अहमियत समझ में आती है।

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