Latest News

बापू की पत्रकारिता के लिए मौजूदा माहौल फिर प्रासंगिक

नई दिल्ली, के पी सिंह   -  लाॅक डाउन के कारण देश के मीडिया उद्योग की भी कमर टूट  गयी है। ऐसे में अन्य उद्योगों  की तरह मीडिया को भी विशेष पैकेज देने की सरकार से उठ रही मांग के बीच लोगों को महात्मा गांधी की पत्रकारिता याद आ रही हैै,  जिन्होंने अपने अखबारों के लिए कभी विज्ञापन तक नहीं लिए। पढ़ाई पूरी करने के बाद महात्मा गांधी वकालत की प्रैक्टिस के लिए दक्षिण अफ्रीका बस गये थे। उन दिनों रंगभेद नीति के प्रतिकार की वजह से दक्षिण अफ्रीका के भारतीय समुदाय  में  उनकी चर्चा होने लगी थी। इसी दौरान दक्षिण अफ्रीका के भारतीयों ने उनसे इंड़ियन ओपिनियन अखबार का संपादन संभालने को कहा, जिसे भारतीय समुदाय ने अपनी अस्मिता को मजबूत करने के लिए निकाला था। यह अखबार घाटे में निकला, जिससे विज्ञापन मिलने के बावजूद गांधी जी को इसमें अपनी जेब से पैसा लगाना पड़ा। इसके बावजूद गांधी जी ने अखबार को लेकर आश्चर्यजनक फैसला किया कि वे इसमें कोई विज्ञापन नहीं छापेंगे क्योंकि वे जिन विचारों को अपने समाज के साथ साझा करना चाहते हैं, विज्ञापन छापने से उनके लिए जगह घटानी पड़ती है। विचारों की इस पत्रकारिता को गांधी जी ने स्वदेश वापसी के बाद भारत में भी आगे बढाया और यहां भी अपने अखबारों में विज्ञापन न छापने का व्रत बरकरार रखा। जो लोग मीडिया को पश्चिम के प्रभाव मेें सूचना का व्यापार समझते हैं उन्हें बताना चाहता हूं कि गांधी जी के अखबार उनके विचारों के कारण विज्ञापन न छापने के बावजूद फायदे में चलते थे। जब गांधी जी जेल चले
गये थे तो उनके अखबार का प्रसार गर्त में चला गया था। सोचने वाली बात है कि भारत में लोग मीडिया से क्या चाहते है, विचार  या  समाचारों का मनोरंजन ?
भारतीय पत्रकारिता की इसी तासीर को समझने के कारण आजादी के बाद के कुछ दशकों तक नामी अखबार कम्पनियों में विद्वानों की सम्पादक के रूप में नियुक्ति की परम्परा कायम रही ताकि अखबार में वैचारिक मजबूती दिख सके। इन सम्पादकों से अखबार मालिक विज्ञापन मांगने या सरकार से उनके धन्धे के काम कराने की अपेक्षा बिल्कुल नहीं रखता था। बाद में पाश्चात्य अनुकरण के तहत मीडिया को जब सूचना के व्यापार के रूप में ढाल दिया गया तो संम्पादक से लेकर रिपोर्टर तक लाइजनिग की क्षमता देखकर बनाये जाने लगे। मीडिया में वैचारिक पक्ष गौण हो जाने से उसकी गरिमा छिन्न भिन्न हो गयी और इसका अर्थ भी बड़ी दुकानदारी से ज्यादा नहीं रह गया है। कायदे से भारत में मीडिया को कारपोरेट सेक्टर के दायरे से बाहर होना चाहिए ताकि उसका पुराना स्वरूप बहाल हो सके। समाज की वैचारिक चेतना के सतत विकास के लिए मीडिया की जरूरत भारत में मूल रूप से महसूस की जाती है और उसे इसी पटरी पर लाना होगा, जिसमें 24 घंटे की खबरों की कोई प्रासंगिकता नहीं है। केन्द्रीयकृत मीडिया  पर विराम लगने से सोशल मीडिया और स्थानीय मीडिया के अन्य मोड फलेंगे-फूलेंगे, जिससे लोकतन्त्र की भी अधिक सेवा होगी और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता को भी सार्थकता मिलेगी।

No comments