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रमजान माह सब्र, शुक्र व परहेज की देता सीख

फतेहपुर, शमशाद खान । रमजा़न माह एक प्रशिक्षंण का महीना है। इस महीने का मकसद इंसान को सब्र, शुक्र और परहेज़ करने की ट्रेनिंग देना है। इज्जत, दौलत और ऐशो आराम पाने की तमन्ना करना और उसके लिए कोशिश करना न कोई गुनाह है और न कोई बुरी बात। बल्कि हकी़कत यह है कि यह सब चीजे इंसान के लिए ही है। इनको पाने की कोशिश करने में इमानदारी की हदों से बाहर न जाने को ही सब्र कहते है। रोजा हमें सब्र करने का प्रशिक्षंण देता है कि दिन के खत्म होने तक हम पर खाना पीना जायज़ नही है। अगर रोजे की हालत में रोजदार को कोई गुस्सा दिलाए या लडने पर उभारे तो उससे बदला नहीं लेना है बल्कि यह कह कर कि मै रोजे से हूॅ, अलग हो जाना है। एक महीने तक रोज ऐसे रोजे रखने पर इंसान सब्र करना सीख जाता है और फिर वो अपने सब्र करने की क्षमता को खाने
पीने से हटा कर दूसरी हराम चीजो़ं पर बड़ी आसानी से इस्तेमाल कर सकता है। शुक्र जो इंसान शुक्रगुजार होता है। वह कभी अहंकारी व घमण्डी नहीं हो सकता। दूसरों पर जुल्म करना, दूसरों को सताना, दूसरों की सही बात न सुनना, लोगों की मद्द न करना और दूसरों को अपने से नीचा समझने की मानसिकता घमण्ड के ही रूप है। इस्लाम में हर तरह के अहंकार घमण्ड, तकब्बूर को सख्ती से मना किया गया है। परहेज़ ईश्वर (अल्लाह) द्वारा मनुष्य को जिन चीजो़ं या कार्यो से परहेज़ करने का आदेश दिया गया है। उनसे बचना परहेज़ कहलाता है। जैसे झूठ बोलना, दूसरो को सताना, गलत तरह से पैसा कमाना, अशान्ति फैलाना, साहिबे हैसियत होकर गरीबों की मद्द न करना, शर पैदा करना, शराब का सेवन करना आदि वह कार्य है, जिनका करना पाप और गुनाह है। बुरे कार्यो से बचना ही परहेज कहलाता है। इसी के साथ-साथ ईश्वर अल्लाह को झुकाव पसन्द है। भूख और प्यास इंसान मे कमजोरी पैदा करती है और कमजोरी इंसान के अन्दर झुकाव पैदा करती है। रमजान माह हमे वक्त की पाबन्दी, नमाज, सब्र, शुक्र, और परहेज की सीख देता है। 

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