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प्रदेश की राजनीति में फंसा पेंच...

भाजपा के गले की हड्डी बने सिंधिया

उपचुनाव के बाद कांग्रेस सरकार आहट!!

मध्यप्रदेश, अंकित जैन  । भाजपा ने सिंधिया के साथ जोड़तोड़ कर प्रदेश में अपनी सरकार जल्दबाजी में बना तो ली। लेकिन दूरगामी परिणामों पर विचार नहीं किया गया कि राष्ट्रीय स्तर पर तो सिंधिया का तालमेल बैठ जायेगा किन्तु स्थानीय स्तर पर सिंधिया के समर्थकों का तालमेल भाजपा की विचारधारा व नीतियों के अलावा स्थानीय बीजेपी नेताओं के साथ बहुत मुश्किल है?क्योंकि यह पूर्व के चुनावों में एकदूसरे के घोर विरोधी रह चुके हैं। यह तो मालूम ही था कि उपचुनाव में सिंधिया समर्थकों को टिकिट दिया जाएगा और सिंधिया समर्थकों को स्थानीय भाजपा नेताओं का साथ नहीं मिलेगा और स्थानीय भाजपा नेताओं को अपना राजनीतिक भविष्य अंधकारमय नजर आने लगा है। जिससे यह स्थानीय भाजपा नेता सिंधिया समर्थकों का विरोध करेंगे और भाजपा में बगावत के स्वर मुखर होंगे और कांग्रेस ने भाजपा के बगावत करने वाले नेताओं को खुला आमंत्रण दिया है। स्थानीय भाजपा नेताओं के
पास कांग्रेस ज्वाइन करना या निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में मैदान पकड़ने का विकल्प बचता है जिससे भाजपा को भारी नुकसान होने की संभावना है। उपचुनाव में अगर सिंधिया समर्थक विजयी नहीं हो सके तो भाजपा की सरकार को खतरा उत्पन्न हो जाएगा और पुनः प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बहुमत हासिल कर सकती हैं, इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है!! भाजपा के लिए सिंधिया गले की हड्डी बन गए हैं न खाते बन रहा है और न ही निगलते बन रहा है। भाजपा का यह सियासी दाँव उल्टा होता दिखाई दे रहा है! 
       संघ के गोपनीय सर्वे के अनुसार सिंधिया के 19 समर्थक उपचुनाव जीतते नजर नहीं आ रहे हैं और 3 सीटों पर कड़ी टक्कर होने की संभावना हैं। इस सर्वे रिपोर्ट ने भाजपा आलाकमान की नींद उड़ा दी है। उपचुनाव के बाद कांग्रेस सरकार बनने की आहट सुनाई दे रही हैं!!

भाजपा में बगावत के स्वर हो रहे मुखर

प्रदेश भाजपा को उपचुनाव के टिकिट वितरण के दौरान बगावत की सुगंध अभी से आने लगी है। सिंधिया समर्थकों को उपचुनाव में टिकिट दिया जाता हैं तो स्थानीय भाजपा नेताओं की राजनीतिक विरासत को खतरा नजर आ रहा है और स्थानीय भाजपा नेता सिंधिया समर्थको को अपना समर्थन न देते हुए विरोध कर रहे हैं और बगावत कर कांग्रेस के साथ जा सकते है या निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में मैदान पकड़ सकते हैं। रूठे हुए को मनाने के लिए भाजपा ने उन्हें संगठन औऱ निगम, मंडल में राज्य मंत्री का दर्जा देकर संतुष्ट करने का अभियान प्रदेश अध्यक्ष ने प्रारम्भ कर दिया है।

सिंधिया ने भाजपा ज्वाइन करके बड़ी राजनीतिक भूल की

भाजपा अपने आपको एक अनुशासित पार्टी कहती हैं। सिंधिया समर्थको को अनुशासित रहकर भाजपा की विचारधारा, नीतियों को अपनाना होगा एवं भाजपा नेताओं के साथ तालमेल भी बिठाना होगा? यह सिंधिया समर्थकों के लिए आसान नहीं है।  सिंधिया समर्थक दवाब की राजनीति करते हैं। मात्र दो महीने में ही संबधो में खटास आने लगी है और सिंधिया समर्थक बेचैन नजर आ रहे हैं। सिंधिया समर्थकों को उपचुनाव जीतना मुश्किल नजर आ रहा है! सिंधिया को भाजपा ज्वाईन करने की बजाय नई पार्टी का गठन कर भाजपा को समर्थन दे देते तो सिंधिया समर्थकों को आज यह मुसीबत का सामना नहीं करना पड़ता। ऐसा लग रहा है कि सिंधिया भी पछता रहे हैं और भाजपा भी बेचैन नजर आ रही हैं। सिंधिया ने भाजपा ज्वाइन कर एक बड़ी राजनीतिक भूल कर दी है। सिंधिया समर्थक दवाब की राजनीति करते है जिससे भाजपा का अनुशासन भंग होता है और भाजपा नेताओं में अच्छा संदेश नहीं जा पा रहा है। दो महीने में ही तलाक की नोबत आ गई।

सिंधिया को रखना होगा धैर्य

उपचुनाव में भाजपा हाईकमान जीतने वाले उम्मीदवारों को टिकिट दे औऱ सिंधिया समर्थकों को निगम मंडल में सम्मानजनक पद देकर उन्हें संतुष्ट करे। सिंधिया ने भाजपा की विचारधारा को अपनाया है तो अब भाजपा की रीति नीति व अनुशासन के साथ चलना होगा। और धैर्य बनाये रखने में ही राजनीतिक समझदारी हैं। इसी में अब सिंधिया की भलाई है अन्यथा सिंधिया जी न तो कांग्रेस रहे और न ही बीजेपी के रहेगे!धोबी का कुत्ता घर का न घाट का वाली कहावत चरितार्थ हो जायेगी।

कांग्रेस उपचुनाव में कद्दावर नेताओं को मैदान में उतरेगी

प्रदेश का राजनीतिक सियासी ड्रामा उपचुनाव में अपने चरम सीमा पर होगा। कांग्रेस उपचुनाव जीतने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाकर अपने कद्दावर नेताओं को मैदान में उतारेगी। भाजपा की ओर से सिंधिया समर्थक मैदान में होंगे। देखते राजनीति में ऊंट किस करवट बैठता है।

दोनो ही दलों की राजनीतिक रस्सा कस्सी में प्रदेश का विकास हो रहा अवरुद्ध

कांग्रेस औऱ भाजपा अपनी सरकार बनाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं और राजनीतिक ड्रामा कर सकते हैं। दोनो दलों की आपसी लड़ाई में प्रदेश का विकास पिछले डेढ़ वर्ष से रुका हुआ है और कोरोना महामारी के कारण आम नागरिकों की अर्थव्यवस्था भी चौपट हो गई हैं।

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