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लाकडाउनः मजदूर या मजबूरी...


फतेहपुर, शमशाद खान । लाॅकडाउन के बाद कोरोना जैसी महामारी बीमारी से बचने के लिये लोग लगातार बडे शहरो से पलायन कर रहे हैं। जिसमें सबसे ज्यादा मजदूर तबके के लोग भूखे, प्यासे पैदल ही सफर करने के लिये मजबूर है। इन दिनों नेशनल हाईवे पर दिल को झकझोर देने वाली तस्वीर देखने को मिल रही है। जिसे देखकर सरकार के सिस्टम की पूरी पोल खुल जाती है। जिस तरह से प्रवासी मजदूर गुजरात, महाराष्ट्र, दिल्ली व हरियाणा समेत अन्य राज्यों से किसी तरह अपने वतन पहुंचने के लिये कोरोना जैसी बीमारी का भी परवाह न करते हुए अपने परिवार के साथ पैदल व ट्रकों में इस तरह से सफर करते हैं जिसमें किसी तरह की सोशल डिस्टेंसिंग का ध्यान नही 
मुम्बई से मासूम को गोद में लेकर पैदल सफर तय करते दम्पति।
दिया जाता। किसी भी हाल में अपने वतन पहुंचने की हर मुमकिन कोशिश की जा रही है। एक ऐसी ही तस्वीर मंगलवार को नेशनल हाईवे में उस वक्त देखने को मिली जब एक दम्पति अपने आठ माह के मासूम को गोद में लेकर मुम्बई से पैदल सफर तय कर पड़ोसी जनपद बांदा के बबेरू जा रहे थे। प्रवासी मजदूर रत्नेश प्रजापति ने बताया कि अपनी पत्नी नगीना देवी व आठ माह की बेटी दीक्षा को लेकर दस दिन पूर्व वह अपने गांव बांदा के कोर्रा खुर्द गांव के लिये मुम्बई से निकले थे। पैदल चलते-चलते उनके व पत्नी के पैरो में छाले तक पड़ गये है। कहीं-कहीं रास्ते में पुलिस वालों ने ट्रक में बैठाया लेकिन कुछ दूर बाद उन्हे उतार दिया गया। जिसके बाद वह पैदल ही सफर तय करते रहे। इस तरह की अनेक तस्वीरें इन दिनों जनपद के नेशनल हाईवे पर देखी जा सकती हैं लेकिन इनका हाल लेने वाला कोई भी नहीं है। सरकार तमाम दावे प्रवासी मजदूरो के लिये करती है लेकिन नेशनल हाईवे से गुजरने वाले प्रवासी मजदूरो को देखकर यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि सरकार की सभी व्यवस्थायें पूरी तरह से फेल हैं। यहां तक कि पैदल चलते-चलते तमाम मजदूर इस दुनिया को अलविदा कह चुके हैं। 

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