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राष्ट्रधर्म प्रथम ना की जाती पाति......................... देवेश प्रताप सिंह राठौर (वरिष्ठ पत्रकार)


. हम आप बहुत किस्से कहानियां सुनते हैं परंतु वही कहानी और किस्से हकीकत में तब्दील हो जाते हैं तव पूरा सिस्टम बिगड़ने लगता है आज पूरा भारत हर जात के धर्म के लोग जो हिंदुस्तान के रहने वाले हैं वह सब एक धारणा बनाएं कि देश हमारा है देश के लिए हम गद्दारी करेंगे तो देश की सरकार जनता कभी माफ नहीं करेगी आज के दौर पर जिस तरह हम लोग गुजर रहे हैं यह कोई छोटी बात नहीं है बहुत बड़ी समस्या है इस समस्या को हराने के लिए जाति धर्म से ऊपर उठकर भाईचारा रखकर हम आपसे सरकार के दिए गए निर्देशों का पालन करें क्योंकि यह कोरोना वायरस बहुत लोग जो धर्म के नाम से लड़ाना चाहते हैं वही है नहीं जानते पूर्व ना किसी जात धर्म के नाम से नहीं आएगा वह किसी को किसी की लापरवाही से आ सकता है आप सुनते होंगे कोई लोग गंदी गंदी हरकतें करके मजहब धर्म को बदनाम करते हैं जबकि एक व्यक्ति के करने से पूरा समाज अपनी जात को प्रश्न लग जाता है वह प्रश्न चिन्ह ना लगे सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय हे भाव के साथ हमें आपको इस संकट के दौर से निकलना है और जो रमजान का पाक महीना चल रहा है अच्छी सोच के साथ अच्छे विचारों के साथ भाई चारों के साथ हम सब लोग मिलकर नियमों का पालन करते हुए शीघ्र से शीघ्र कोरोना को भगाना है और खुशी के माहौल में सब लोग मिलकर एक राष्ट्रवादी का संदेश पहुंचाएं और आपसी भाईचारा बनाए रखते हुए जाति धर्म भूलकर सब एक होकर राष्ट्रवादी वनेआज भाईचारे की भावना मन को मन से व हृदय से हृदय को जोड़ती है। परिवार और समाज भाईचारे की भावना पर खड़े हैं। परिवार में समरूपता और सभ्य समाज इसी के परिणाम हैं। भाईचारे के वातावरण में प्रेम एवं सद्भाव की दिव्यता छलकने लगती है। इसके अभाव में वैमनस्य, विघटन, अलगाव और अविश्वास का वातावरण बनता है। समाज में दुर्भावनाएं और कटुता फैलती हैं। भ्रातृत्व की भावना का विकास करना ही एकमात्र समाधान है।उपनिषद् कहते हैं कि जहाँ भ्रातृत्व भाव होता है, वहाँ सुख, शान्ति और प्रसन्नता छलकती रहती है। एकाकी जीवन और अलगाव में न सुख है और न शान्ति। मनुष्य एक मननशील और सामाजिक प्राणी है। वह समाज से दूर रह कर अकेला जीवन नहीं व्यतीत कर सकता। हमारे जीवन निर्वाह के लिए समाज को सौहार्दपूर्ण वातावरण की आवश्यकता पड़ती ही है।अकेला रहना किसी दंड से कम नहीं है। अत: समाज में रहने का न्यूनतम मापदंड एक ही है-भ्रातृत्व भावना का होना। जब हम इस गुण को विकसित कर लेते हैं तो अपने आप ही समाज का एक अभिन्न और महत्वपूर्ण इकाई बन जाते हैं। एकाकीपन की कठोर यातना से बचने के लिए भ्रातृत्व का भाव विकसित करना जरूरी है। हाथ की पांच उंगलियों के समान मिलजुल कर रहने में ही सुख है। सभी में भ्रातृत्व की भावना किसी न किसी रूप में विद्यमान रहती है। हाँ, किसी में कम या किसी में अधिक हो सकती है। जरूरत है, केवल आपसी प्रेम एवं भाईचारे की।मनुष्यता के बिना मनुष्य की कल्पना संभव नहीं। जैसे सूरज की उष्णता, चन्द्रमा की शीतलता, जल की तरलता और दीपक का प्रकाश ही उनकी सच्ची विशेषता है, उसी प्रकार मनुष्यता मनुष्य का गुण धर्म है। भ्रातृत्व भाव इस गुण का अभिवद्र्घन है। हम मनुष्य एक हरे-भरे वृक्ष की एक टहनी के समान हैं। हमारा अस्तित्व तभी तक है, जब तक वृक्ष विद्यमान हैं। हमारा आपका अस्तित्व तभी है जब हम आप सब ईर्ष्या भूलकर आपस में मिलजुल कर रहे क्योंकि आज का वातावरण पूरे विश्व का जिस स्थिति में देखा जा रहा है वह आप समझ रहे हैं आज यह जरूरी नहीं है हम किस जाति धर्म के हैं जरूरी यह है कि हम जो कोरोना वायरस की मार पूरे विश्व के साथ भारत में भी फैल रहा है इसे हम सब बिना जाति धर्म के सब एक होकर एकता का प्रतीक बनेगा और इस संकट में सरकार के दिए गए दिशा निर्देशों का पूर्ण पालन करें क्योंकि आज पूरा विश्व कोरोना वायरस की मार से त्रस्त है आर्थिक रूप से देश में मंदी का दौर आ रहा है क्यों की आज हम सब लॉक डाउन में है जो कोरोना वायरस का बहुत बड़ा अस्त्र जिससे हम कोरोना को मात दे पाएंगे।

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