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सामाजिक न्याय के प्रणेता बीपी मंडल जी को उनके स्मृति दिवस पर कोटि- कोटि नमन

बिहार, संजय सक्सेना -  आज बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री व पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष बीपी मंडल जी का स्मृति दिवस है। बिन्देश्वरी प्रसाद मंडल जी उस महान स्वंत्रता सेनानी और यादव जाति के विभूति रासबिहारी लाल मंडल के पुत्र थे, जो ज़मींदार होते हुए भी कांग्रेस के पार्टी के बिहार से स्थापना सदस्यों में एक थे उन्होंने अंग्रेजों से लोहा लिया और 1911 में बिहार, बंगाल व उत्तर प्रदेश के अग्रणी यादवों को साथ लेकर अखिल भारतीय गोप जातीय महासभा (जिसे बाद में यादव महासभा कहा गया) की स्थापना की. रासबिहारी बाबू के अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ाई पर तत्कालीन प्रसिद्ध अख़बार अमृत बाज़ार पत्रिका ने 1908 में अपने सम्पादकीय में उनकी तारीफ की, और दरभंगा महराज ने उन्हें 'मिथिला का शेर' कह कर संबोधित किया. 1918 में बनारस में 51 वर्ष की आयु में जब रासबिहारी बाबू का निधन हुआ तो वहीँ बीपी मंडल का जन्म हुआ. रासबिहारी लाल मंडल के बड़े पुत्र भुवनेश्वरी प्रसाद मंडल थे जो 1924 में बिहार-उड़ीसा विधान परिषद् के सदस्य थे, तथा 1948 में अपने मृत्यु तक भागलपुर लोकल बोर्ड (जिला परिषद्) के अध्यक्ष थे. दूसरे पुत्र कमलेश्वरी प्रसाद मंडल आज़ादी की लड़ाई में जय प्रकाश बाबू आदि के साथ गिरफ्तार हुए थे और हजारीबाग सेन्ट्रल जेल में थे। 1937 में बिहार विधान परिषद् के सदस्य चुने गए। बीपी मंडल 1952 में मधेपुरा विधान सभा से सदस्य चुने गए। 1962 में पुनः चुने गए और 1967 में मधेपुरा से लोक सभा सदस्य चुने गए. 1965 में मधेपुरा क्षेत्र के पामा गांव में हरिजनों पर सवर्णों एवं पुलिस द्वारा अत्याचार पर वह कांग्रेस को छोड़ सोशलिस्ट पार्टी में आ चुके थे। बड़े नाटकीय राजनैतिक उतार-चढ़ाव के बाद 1 फरवरी 1965 में बिहार के पहले यादव मुख्यमंत्री बने। इसके लिए उन्होंने सतीश बाबू को एक दिन के लिए मुख्यमंत्री बनवाया। बीपी मंडल 6 महीने तक सांसद थे, और बिहार सरकार में स्वास्थ्य मंत्री भी थे। वे राम मनोहर लोहिया जी एवं श्रीमती इंदिरा गाँधी की इच्छा के विरुद्ध बिहार में पहले पिछड़े समाज के मुख्यमंत्री बनने जा रहे थे,  परन्तु विधानसभा में बहुमत के बावजूद तत्कालीन ब्राह्मण राज्यपाल रांची जाकर बैठ गए और मंडल जी को शपथ दिलाने से इस आधार पर इंकार कर दिया कि बीपी मंडल बिहार में बिना किसी सदन के सदस्य बने 6 महीने तक मंत्री रह चुके है. परन्तु बीपी मंडल ने राज्यपाल को चुनौती दी और इस परिस्थिति से निकलने
के लिए तय किया गया कि सतीश बाबू एक दिन के लिए मुख्यमंत्री बन कर इस्तीफा देंगे, जिससे बीपी मंडल के मुख्यमंत्री बनने में राज्यपाल द्वारा खड़ा किया गया अड़चन दूर किया जा सके। इंदिरा गाँधी और लोहिया जी सभी मंडल जी के व्यक्तित्व से डरते थे और नहीं चाहते थे कि सतीश बाबू इस्तीफा दें। परन्तु सतीश बाबू ने बीपी मंडल का ही साथ दिया। 
आगे की कहानी और दिलचस्प है। उन्ही दिनों बरौनी रिफायनरी में तेल का रिसाव गंगा में होने से उसमें आग लग गयी। बिहार विधान सभा में पंडित बिनोदानंद झा ने कहा कि शुद्र मुख्यमंत्री बना है तो गंगा में आग ही लगेगी! इस बात का साक्ष्य तो बिहार विधानसभा के रिकार्ड में है। बात पहली बिहार विधान सभा की है, जब  बीपी मंडल ने आपत्ति की थी कि यादवों के लिए विधान सभा में 'ग्वाला' शब्द का प्रयोग किया गया। सभापति सहित कई सदस्यों ने कहा की यह असंसदीय कैसे हो सकता है क्योंकि यह शब्दकोष (Dictionary) में लिखा हुआ है। मंडल जी ने कुछ गालियों का उल्लेख करते हुए कहा कि ये भी तो शब्दकोष (Dictionary) में है। फिर इन्हें असंसदीय क्यों माना जाता है। सभापति ने मंडल जी की बात मानते हुए, यादवों के लिए 'ग्वाला' शब्द के प्रयोग को असंसदीय मान लिया, लेकिन उन दिनों किन जातिवादी हालातों में बातें हो रही थी, इसका अंदाज़ मुश्किल है. 
1968 में उपचुनाव जीत कर वह पुनः लोक सभा सदस्य बने। 1972 में मधेपुरा विधान सभा से सदस्य चुने गए। 1977 में जनता पार्टी के टिकट पर मधेपुरा लोक सभा से सदस्य बने। 1977 में ही  जनता पार्टी के बिहार संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष के नाते लालू प्रसाद को कर्पूरी ठाकुर और सत्येन्द्र नारायण सिंह के विरोध के बावजूद छपरा से लोक सभा टिकट मंडल जी ने ही दिया। 1948 में कर्णाटक के चिकमंगलूर से श्रीमती इंदिरा गाँधी के लोक सभा में आने पर जब उनकी सदस्यता रद्द की जा रही थी, तो मंडल जी ने इसका पुरजोर विरोध किया. 1 जनवरी 1979 को प्रधान मंत्री मोरारजी देसाई ने बीपी मंडल को पिछड़ा वर्ग आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया, मंडल जी ने इस दायित्व को बखूबी निभाया। इनकी रिपोर्ट को लाख कोशिश के बावजूद सर्वोच्च न्यायलय में ख़ारिज नहीं किया जा सका। उसके बाद की घटनाएं तो तात्कालिक इतिहास में दर्ज है। बीपी मंडल जी की मृत्यु 13  अप्रैल 1982 को 63 वर्ष की आयु में हो गयी.

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