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डोनाल्ड ट्रंप जैसे 'बेवकूफ' धरती पर दुर्लभ ही हैं!

कहते हैं खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी यही कर रहे हैं. अपने सर्वाधिक विकसित देश अमेरिका में कोरोना का प्रसार रोकने में जैसे-जैसे वह असफल होते जा रहे हैं, वैसे-वैसे उनकी चिढ़न और कुढ़न सामने आती जा रही है, भारतीय प्रधानमंत्री से पिछले दिनों उन्होंने लम्बी बातचीत की और हाइड्रोक्लोरोक्वीन दवा के लिए उन्होंने भारत से विनती की, इस क्रम में भारत में उन्हें आश्वासन भी दिया कि अपनी घरेलू जरूरतों को देखकर इस पर फैसला लिया जाएगा. चूंकि वर्तमान समय में मलेरिया की प्रतिरोधक यह दवा कोरोना संक्रमण से बचाव के लिए बेहद आवश्यक हो चुकी है, इसलिए हर किसी देश को इसकी आवश्यकता पड़ रही है। अभी दोनों राष्ट्र अध्यक्षों की बात को 24 घंटे भी नहीं हुए थे कि ट्रंप की तरफ से धमकी आने लगी कि अगर भारत ने इस ज़रूरी दवा का निर्यात नहीं किया तो अमेरिका भी जवाबी कार्रवाई कर सकता है ।

अब इसे बेवकूफी नहीं कहें तो क्या कहें?
आप जरा याद कीजिए डोनाल्ड ट्रंप के उस वक्तव्य को जो उन्होंने उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग से तनाव के समय में दिया था. परमाणु शस्त्रों पर उत्तर कोरियाई तानाशाह किम जोंग से उलझते हुए ट्रंप ने यहां तक कह डाला था कि उनके टेबल पर परमाणु बम का बड़ा बटन है। देखा जाए तो उनके तबके बयान और अब के बयान में कुछ खास फर्क नहीं है, बल्कि तब भी उन्होंने बेवकूफी का ही परिचय दिया था और आज भी वह बेवकूफी का ही परिचय भी दे रहे हैं।अमेरिका जैसे विकसित राष्ट्र की इस बात के लिए कड़ी आलोचना की जा रही है कि शुरुआत से ही उन्होंने कोरोनावायरस के खतरे को कम करके आंका और अपने देश में ना तो टेस्टिंग और ना तो सोशल डिस्टेंसिंग के लिए जरूरी एहतियात किया. इसका
परिणाम यह निकला कि चीन, इटली, स्पेन और दूसरे कई यूरोपीय देशों से भी ज्यादा मरीज अमेरिका में हो गए हैं और वहां की व्यवस्था चरमराने लगी है. ऐसी स्थिति में ट्रंप का फटना स्वभाविक है। अमेरिका की स्थिति को इसी बात से समझा जा सकता है कि वहां 3,11,357 से अधिक लोग कोरोना वायरस से संक्रमित हो चुके हैं. साथ ही इनमें से 8,452 से ज्यादा लोगों की जान तक जा चुकी है. यह बात जानकर कोई भी देश डर जायेगा कि सबसे ज्यादा प्रभावित न्यूयॉर्क में हॉस्पिटल्स से लाशों को रात में निकाला जा रहा है, जिससे लोगों के बीच डर न फैले. इधर स्थिति गम्भीर होती जा रही है और उधर ट्रम्प को मजाक सूझ रहा है. अति गंभीरतम स्थिति में ट्रम्प किसी जोकर की भांति व्यवहार कर रहे हैं। भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्था ने बड़ा रिस्क लेकर जिस तरह से 3 हफ्ते का लॉक डाउन किया, उससे हर कोई आश्चर्य में पड़ गया. अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इसे बेशक बेवकूफी भरा कदम मान रहे हों, लेकिन हकीकत यह है कि हजारों लोगों को मरने से वह नहीं बचा पाए हैं!

इसके तर्क में वह इकोनॉमी के डूबने की बात कर रहे हैं, लेकिन उन्हें समझना चाहिए कि अगर लोग ही नहीं रहेंगे तो वह किसके लिए इकॉनमी बचाएंगे? शायद वह अमेरिका के सिर्फ और सिर्फ विकास को लेकर ही गंभीर हैं और बाकी बातें उनके लिए गौण हो चुकी हैं. वैसे भी उनका चुनावी नारा था "मेक अमेरिका ग्रेट अगेन"! ऐसी स्थिति में शायद उन्हें डर सता रहा है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था को लेकर लोगों को वह क्या जवाब देंगे और इसी राजनीति की वजह से चुनाव हारने का उनके भीतर डर पैदा हो गया है. यह एक बड़ी वजह है, जिसे लेकर अपने देश में कड़ा फैसला नहीं ले पा रहे हैं।

आखिर यही तो है एक असली और एक नकली लीडर की पहचान!
आखिर डोनाल्ड ट्रंप जैसे बेवकूफ लीडर ने लाखों अमेरिकंस की जान को खतरे में डाल दिया है. अब वह चाहे चिल्लाएं, चाहे किसी को धमकाएं, चाहे रोएं या फिर ठिठोल करके वर्तमान गंभीरता को हँसी में उड़ा दें, लेकिन हकीकत यह है कि कोरोना जैसे संकट ने उन्हें घुटनों पर ला खड़ा किया है. अपने आप को एक बेहतरीन बिजनेसमैन और सबसे समझदार राजनेता समझने के अहंकार ने उन्हें किस प्रकार आईना दिखाया है, यह समय उन्हें बखूबी बतला रहा है। वैसे भी चीन और भारत जैसे देशों से वह कहीं ना कहीं हीन भावना रखते हैं. कोरोना जैसा वायरस जब पूरी दुनिया में फैला तो इसे उन्होंने चीनी वायरस बता कर अपनी नस्ल भेदी मानसिकता का ही परिचय दिया. इतना ही नहीं, वह सहयोग के मामले में भी शुरुआत से ही आनाकानी करते रहे और अब हकीकत यह है कि भारत जैसे देशों के सामने उन्हें गिड़गिड़ाना पड़ रहा है, लेकिन इस गिड़गिड़ाहट को वह अपनी खोखली धमकी देकर सिर्फ और सिर्फ अपनी अद्भुत बेवकूफी को ही उजागर कर रहे हैं। भला इसके अतिरिक्त उनका प्रयास और क्या जाहिर करता है? उम्मीद की जानी चाहिए कि समस्त विश्व के साथ सहयोग करके अमेरिका शोध कार्यों पर अपने प्रयत्नों को बढ़ायेगा और अग्रणी होने के नाते विश्व की मदद करेगा, ना कि बेवजह की धमकियां देकर दूसरे देशों को अपमानित करेगा या फिर दूसरे देशों के साथ अपनी भी कठिनाई बढ़ाएगा। हालाँकि, भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह मानवीयता के आधार पर दवाओं का निर्यात करेगा और इसी के तहत उसने दवाओं पर निर्यात-प्रतिबन्ध को आंशिक तौर पर हटाया भी है। अमेरिका सहित ब्राजील और दूसरे देशों को ज़रूरी हाइड्रोक्लोरोक्वीन दवा निर्यात करने का भारतीय फैसला तारीफ़ के काबिल है. इसके महत्त्व को असल तौर पर रेखांकित किया है ब्राजील के राष्ट्रपति ने, जिनसे डोनाल्ड ट्रम्प को सीखने की ज़रुरत है।

पीएम नरेन्द्र मोदी को लिखे लेटर में ब्राजीली प्रेसिडेंट जायर बोलसोनारो ने कहा है कि "जिस तरह से बजरंग बली, भगवान राम के भाई लक्ष्मण की प्राण-रक्षा हेतु हिमालय से संजीवनी लाए थे, उसी तरह से भारत की ओर से यह मदद भी लोगों की जिंदगी बचाएगी."

इसे कहते हैं कृतज्ञता, जिसे ट्रम्प जैसा एक कुटिल, स्वार्थी बिजनेस मैन शायद ही समझ पाए। हालाँकि, अपनी कुटिलता दिखलाते हुए ट्रम्प ने बाद में भारतीय प्रधानमंत्री को महान भी बतलाया है, लेकिन असल बात यही है कि वह अपने छद्म और पल-पल बदलते व्यवहार से सिर्फ अपनी बेवकूफी ही जाहिर कर रहे हैं. बेहतर हो कि वह अमेरिकंस के प्रति अपने कर्तव्य को चुनावी राजनीति से ऊपर उठकर निभाएं और सच में अगर वैश्विक स्तर पर अमेरिका को बड़ा रखना चाहते हैं तो आरोप-प्रत्यारोप छोड़कर मुसीबत की इस घड़ी में बड़ा रोल प्ले करें.
यही सार्थकता है और वक्त की ज़रुरत भी। 

साभार : - मिथिलेश कुमार सिंह, नई दिल्ली.

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