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कोरोना संकट: नौबस्ता स्थित नवीन गल्ला मंडी में करीब पांच सौ पल्लेदार अनाज की बोरियों की ढुआई करके अपने परिवार का पाल रहे थे पेट,लॉकडाउन चलते अब कमाई भी नही हो रही

वैसे तो कोरोना संकट की दुश्वारियां सभी लोग झेल रहे हैं, लेकिन कुछ लोग ऐसे हैं जिनके लिए यह वक्त मुसीबतों के पहाड़ की तरह है। असंगठित क्षेत्र में आते पल्लेदार इनमें से एक हैं। नौबस्ता स्थित नवीन गल्ला मंडी में करीब पांच सौ पल्लेदार अनाज की बोरियों की ढुआई करके अपने परिवार का पेट पाल रहे थे।
आमजा भारत सवांददाता:- लॉकडाउन की वजह से सब कुछ बंद हुआ तो इनकी कमाई पर भी ताला लग गया। करीब 300 पल्लेदार लॉक डाउन के एक हफ्ते बाद ही अपने घरों को चले गए, लेकिन दो सौ के आसपास पल्लेदार अभी भी गल्ला मंडी में ठहरे हुए हैं। ये पल्लेदार प्रदेश के अलग-अलग शहरों के हैं और रोजी-रोटी की तलाश में यहां तक पहुंचे हैं।

लॉकडाउन की वजह से गल्ला मंडी में अनाज की आवक कम हो गई है। इसलिए उनके हाथों से काम छिन गया है। पल्लेदार बताते हैं कि 15 दिन पहले यहां रोजाना ढाई सौ से तीन सौ तक ट्रक अनाज लेकर आते थे। इस पूरे अनाज को उतारने की जिम्मेदारी हम चार पांच सौ पल्लेदारों के पास होती थी।

भरपूर काम मिल जाता था और ठीक ठीक कमाई होती थी। अब अनाज की आवक दस फीसदी भी नहीं रही। यानी कि मुश्किल से 15-20 ट्रक ही अनाज रोज आ पाता है। इस वजह से हर पल्लेदार को उसकी जरूरत है के मुताबिक काम नहीं मिलता।

500 रुपये तक कमा लेते थे
गल्ला मंडी में एक बोरे की पल्लेदारी पांच रुपए जबकि आधे बोरे यानी कट्टी की पल्लेदारी तीन रुपये है। लॉक डाउन से पहले एक पल्लेदार 500 रुपये तक कमा लेता था। अब दिन भर में 50 रुपये भी कमाई नहीं हो पा रही है। शासन की तरफ से भी उन तक कोई राहत राशि नहीं पहुंची है। ये सभी वर्ग से आते हैं कि किसी के सामने हाथ भी नहीं फैला पा रहे हैं।

सरकार से मांगी मदद
गल्ला मंडी में पल्लेदारों ने अपनी स्थिति पर चर्चा करके सरकार ने मदद की अपील की। इस दौरान फतेहपुर के उमाकांत पांडे, बिहार से आए राजेश कुमार, गोंडा के मोनू दीक्षित, राजेश, श्यामसुंदर दीक्षित, कानपुर के सीमा, शांति, माया, अनुज, बिल्हौर के मुकेश कुमार मौजूद थे।

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