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खौफ, भूख, और लूट का दर्द, घर पहुंचने का जुनून

झकरकटी बस अड्डे पर यात्रियों की भारी भीड़ थी। कोई सिर पर गट्ठर लादे था तो कोई शरीर पर कई बैग टांगे। बसों का इंतजार पल-पल भारी हो रहा था। बसों में जगह न मिलने पर कई लोग पैदल भी निकल पड़े।
कानपुर आमजा भारत सवांददाता:-  किसाननगर में ढाबे पर काम करने वाले अंबेडकर नगर निवासी रामकेश व रामसेवक ने बताया कि बस नहीं मिल पाई, इसलिए पैदल ही जा रहे हैं। 300 किमी की दूरी उन्हें तय करनी है, क्योंकि काम-धंधा बंद हो गया और घरवालों की याद आ रही है। अब कैसे भी घर पहुंचना है। प्रयागराज निवासी शिवकुमार, अजय व शिवम टाटमिल में काम करते हैं। बस स्टैंड पहुंचे तो बस नहीं मिली, इसके बाद वह भी पैदल चल पड़े। कहते हैं कि जैसे भी हो अब घर पहुंचना है। सरकार बस का इंतजाम करा देती तो अच्छा था, लेकिन अब पैदल ही चले जाएंगे। काकादेव में रह रहे मऊ निवासी सूरज, आजमगढ़ निवासी रवि व गाजीपुर निवासी अभिषेक भी बस न मिलने के कारण पैदल निकलने को तैयार दिखे। कहा अब निकल रहे हैं, जो होगा देखा जाएगा।



यहां से जाने वालों का ये हाल है तो आने वाले भी पैदल पहुंच रहे हैं। फतेहपुर में रेलवे ट्रैक मेंटीनेंस के दो मजदूर गुरसहायगंज निवासी योगेश कुमार और मैनपुरी निवासी कुंवर पाल शनिवार को पैदल सफर तय करके झकरकटी बस अड्डे पहुंचे। जहां एक संस्था ने उन्हें लंच पैकेट दिया तो जान में जान आई। दोनों ने बताया कि पूरा रास्ता बिस्कुट और पानी के सहारे ही तय किया है। शुक्रवार रात करीब तीन बजे फतेहपुर स्टेशन से पैदल चले थे, आधा किलोमीटर पर एक मैजिक वाले ने लिफ्ट देकर तीन किमी आगे तक छोड़ा। फिर चौडगरा से औंग चेकपोस्ट तक ट्रैक्टर में लिफ्ट मिल गई। बाकी सफर पैदल तय करके कुलगांव मोड़ पहुंचे। आधे घंटे सुस्ताए, फिर कोई सवारी न मिलने पर पैदल ही झकरकटी पहुंचे, लेकिन यहां भी सवारी नहीं मिली तो आगे का सफर भी पैदल ही शुरू कर दिया।

280 रुपये लेकर कंटेनर चालक ने पहुंचाया
मूलरूप से बिठूर निवासी धर्मपाल परिवार के आधा दर्जन लोगों के साथ गुड़गांव से शुक्रवार रात 8 बजे कंटेनर से चले थे। 280 रुपये प्रति व्यक्ति के हिसाब से कंटेनर चालक ने उन लोगों से किराया लिया। रास्ते में कई जगहों पर कंटेनर की चेकिग हुई। जिसमें पुलिस कर्मियों ने लंच पैकेट दिए। दोपहर तीन बजे कंटेनर चालक ने रामादेवी चौराहे पर छोड़ा। वहां से कोई साधन न होने से परिवार के साथ पैदल ही बिठूर तक का सफर तय किया।

पैदल यात्री बोले
लॉकडाउन से लखनऊ में काम नहीं रहा, इसलिए अपने गांव बबेरू के लिए पैदल ही चल पड़ा था। कई जगह पर पुलिस वालों ने डांटा पर काम व पैसों की कमी से शहर में खाने तक की इंतजाम नहीं था।

निखिल कुमार, बबेरू शहर में कोई काम-काज नहीं मिलने के कारण अपने शहर लौटना पड़ रहा है। परिवार पालने के लिए शहर आए थे। यहां तो जान के लाले पड़ गए। कोई भूख-प्यास के लिए पूछता तक नहीं, पता नहीं कैसे पहुंचेंगे।
रामकेश, अंबेडकर निवासी

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