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सामाजिक परिवर्तन................. देवेश प्रताप सिंह राठौर (वरिष्ठ पत्रकार)

........ भारत में जिस तरह से सामाजिक परिवर्तन की ओर अग्रसर है उससे स्पष्ट हो रहा है कि देश प्रगति पर है परंतु जातिगत राजनीति के कारणदेश की स्थितिन्याय प्रिय नहींहो पा रही है। समय लगेगा लेकिन परिवर्तन अवश्य होगा जबकर्म प्रधानको महत्वता दी जाएगी।आज में सामाजिक दार्शनिक विचारधारा के अनुशीलन से यह स्पष्ट होता है कि यहाँ पर विचार के क्षेत्र में बराबर परिवर्तन होता है । यह ठीक है कि पश्चिम की तुलना में भारत में विचारों के क्षेत्र में परिवर्तन की गति बहुत मन्द दिखलाई पड़ती है ।फिर भी इससे यह अनुमान नहीं लगाना चाहिए कि भारत में विचारों के क्षेत्र में परिवर्तन हुआ ही नहीं है । जब कभी सामाजिक-दार्शनिक विचारों में कोई प्रवृत्ति अत्यधिक बढ़ गई तो उसकी विरोधी प्रवृति का जन्म हुआ । उदाहरण के लिए जैन, बौद्ध और चार्वाक जैसे नास्तिक दर्शन वैदिक कर्मकाण्ड के विरोध में उत्पन्न हुए ।इन्होंने धर्म और दर्शन के क्षेत्र में प्राचीन परम्पराओं का विरोध किया । इस विरोध से अनेक सामाजिक परिवर्तन हुए । कालान्तर में ये परिवर्तन देश के लिए हानिकारक सिद्ध हुए; विशेषतया बौद्ध धर्म के प्रचार से राष्ट्र की सुरक्षा-शक्ति बहुत कम हो गई । इसलिए समाज को फिर से शक्तिशाली बनाने के लिए वेदान्त दर्शन का जन्म हुआ ।शंकराचार्य ने प्राचीन भारतीय दर्शन को एक नये शक्तिशाली रूप में स्थापित किया जिससे बौद्ध दर्शन की जन्मभूमि भारत से बौद्ध दर्शन का प्रभाव लगभग उठ गया । आधुनिक काल में अंग्रेजों की आधीनता में लम्बे काल तक दबे रहने के बाद भारतीयतवर्ष में रूढ़ियों और परम्पराओं के क्षेत्र में बराबर परिवर्तन देखा जा सकता है । परिवार विवाह, जाति की संस्था, सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था सभी में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं । संयुक्त परिवार क्रमशः छोटे होते गए हैं और अब केन्द्रक परिवार उनका स्थान लेते जा रहे है स्त्रियों से सम्बन्धित सामाजिक विधान बनने के बाद से विवाह की संस्था में तेजी से परिवर्तन हुआ है ।बाल-विवाह की प्रथा लगभग समाज हो गई है, विधवा-पुनर्विवाह होने लगे हैं, सम्पत्ति में स्त्रियों को अधिकार मिल चुका है । अब उन्हें दत्तक पुत्र ग्रहण करने की भी सुविधा है । स्त्रियों में शिक्षा बढ़ने के साथ-साथ वे सभी क्षेत्रों में पुरुषों के बराबर आ रही हैं ।नगरीय क्षेत्रों में उनकी गतिशीलता में बहुत परिवर्तन हुआ । घर से बाहर स्त्रियों के धनोपार्जन के हेतु काम करने से स्त्री-पुरुष के सम्बन्ध विषयक मूल्यों में परिवर्तन दिखलाई पड़ता है । इससे परिवार की संरचना में भी अनार हुआ है और स्त्री-पुरुष की स्थितियों और कार्यों पर प्रभाव पड़ा हैआधुनिक भारत में जाति की संस्था वर्ण व्यवस्था से हजारों साल के विकास का परिणाम है । इस विकास में बराबर परिवर्तन होते रहे हैं । इस परिवर्तन में नई-नई जातियाँ बनती रही हैं और इन जातियों में सामाजिक स्तरीकरण में ऊँचा स्थान प्राप्त करने के लिए बराबर संघर्ष होते रहे हैं ।इस संघर्ष में अनेक जातियों ने पहले से अधिक ऊँचा स्थान प्राप्त किया है । इस प्रकार जाति व्यवस्था के अन्तर्गत सामाजिक संस्तरण में विशिष्ट जाति का स्थान बदलता रहा है परन्तु कुल मिलाकर जाति व्यवस्था के लक्षणों में अधिक परिवर्तन नहीं हुआ है । जातियों की पंचायतों का सामाजिक नियन्त्रण में महत्व पहले से बहुत कम हो गया है क्रमशः इस प्रकार की पंचायतों की संख्या बहुत कम हो गई है ।राजनीतिक कारणों से एक ओर जातिवाद के फिर से बढ़ने की प्रवृति दिखलाई पड़ती है किन्तु दूसरी ओर शिक्षा के प्रसार, औद्योगीकरण, नगरीयकरण लौकिकीकरण इत्यादि विभिन्न प्रक्रियाओं से जातिवाद कम हो रहा है । भविष्य में जाति व्यवस्था का स्वरूप क्या होगा यह अनिश्चित है । किन्तु स्पष्ट है कि जाति व्यवस्था कभी भी एक सी नहीं रही होगी । उसमें परिवर्तन होता रहाभारतवर्ष में आर्थिक व्यवस्था कभी भी सामाजिक व्यवस्था से पूरी तरह अलग नहीं होती । बहुधा आर्थिक और सामाजिक सम्बन्ध परस्पर घनिष्ट रूप से मिले रहे हैं । उदाहरण के लिए गाँवों में विभिन्न जातियों के सदस्यों के परस्पर सम्बन्ध जजमानी व्यवस्था से नियन्त्रित होते रहे हैं ।जजमानी व्यवस्था से लोगों के आर्थिक और सामाजिक दोनों ही प्रकार के सम्बन्ध निर्धारित होते हैं इनमें कुछ जातियाँ अन्य जातियों की जजमान होती हैं । जजमानी सम्बन्ध परम्परागत रूप से चलते हैं किन्तु वे हस्तान्तरित भी किए जा सकतेनिक काल में जातियों में परिवर्तन होने के कारण तथा पिछड़े वर्गों में जागृति फैलने से जजमानी सम्बन्ध खत्म होते जा रहे हैं । अब विभिन्न व्यक्तियों के परस्पर सम्बन्ध जजमानी प्रथा से नहीं किन्तु उनकी आर्थिक-राजनीतिक स्थिति से निर्धारित होते हैं । हमारा भारत देश विशाल देश है इस विशाल देश में भात भात के लोगों का जीवन शैली है इन्हीं शैलियों में साथ रहकर एक साथ चलने की कला को सीखने की जरूरत है तभी हम कर सकेंगे सबका साथ सबका विकास आज भारत विश्व के पटल पर अच्छी सोच के साथ भारत देश का नाम लिया जाता है।


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