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पुलिस चौकसी के बीच 750 स्थानों पर होलिका दहन

चित्रकूट, सुखेन्द्र अग्रहरी । होलिका दहन पूर्णिमा को भद्रा नक्षत्र खत्म होने के पश्चात ध्वज एवं गजकेशरी योग में जनपद के 750 स्थलों में सोमवार की रात लगभग 11 बजे विधिविधान से पूजन बाद की गई। विभिन्न स्थलों पर होरियारो ने होलिका को विशेष रुप से सजाया था। उत्साह, उमंग और रंगों का त्यौहार होली जिले में धूमधाम से मना। जनपद के विभिन्न कस्बों, गांव और मोहल्लों में होलिका दहन हुआ। होली जलाने के पूर्व पूजा अर्चना और परिक्रमा की गई फिर होलिका दहन किया गया। होलिका दहन स्थलों पर एकत्रित लोगों ने एक-दूसरे को गुलाल लगाकर शुभकामनाएं दी। बच्चों, महिलाओं और पुरुषों ने एक-दूसरे के रंग लगाकर होली खेली और बधाई दी। आज शुक्रवार को जनपद में रंग और अबीर खूब उड़ेगी। होलिका दहन के दौरान पुलिस बल मौजूद रहा।

होलिका दहन की परम्परा का बताया महत्व
चित्रकूट। होलिका दहन के संबंध में अंतर्राष्ट्रीय भागवत कथा प्रवक्ता एवं ज्योतिषाचार्य नवलेश दीक्षित ने बताया कि इस वर्ष फागुन माह की अंतिम पूर्णिमा को होली मनाया जाएगा। हर काल में इस उत्सव की परम्परा और रंग बदलते रहे हैं। उन्होंने बताया कि प्राचीन काल में होली को होलाका नाम से जाना जता था। इस पर्व में होलाका नामक अन्न से हवन करने के पश्चात प्रसाद लेने की परम्परा थी। होलाका अर्थात खेतो में पड़ा हुआ अधपका अन्ना होता है। नई फसल का कुछ भाग पूर्व में देवताओं को अर्पित किया जाता रहा है। बताया कि सिंधु घाटी की सभ्यता के अवशेषों में भी होली मनाए जाने के प्रमाण मिले हैं। होलिका दहन के बारे में बताया कि इसी दिन हिरण्यकश्यप की बहन का होलिका दहन हुआ था। जिसमें विष्णु भक्त बालक प्रहलाद बच गए थे। इसी दिन भगवान शिव ने कामदेव को भस्म करने के पश्चात जीवित किया था। इसी दिन राजा प्रथु ने राज्य को बचाने के लिए राक्षसी ढुंढी को लकड़ी की आग से जलाकर मारा था। फाग उत्सव का विशेष महत्व है। त्रेता युग के प्रारंभ में भगवान विष्णु ने धुलि वंदन किया था। जिसके चलते धुलहणी मनाई जाती है। होलिका दहन के बाद रंग उत्सव की परम्परा भगवान श्रीकृष्ण के काल से प्रारंभ हुई। तभी से इसका नाम फगवाह हो गया। श्री दीक्षित ने बताया कि श्रीकृष्ण पर राधा ने रंग डाला था। इसीकी याद में रंगपंचमी मनाई जाती है। पूर्व काल में होली का रंग टेसू पलाश के फूलों से मनाई जाती थी जो शरीर को कोई नुकसान नहीं पहुंचाता था। होली तिथि की गणना होलाष्टक के आधार पर होती है। फाल्गुन शुक्ल पक्ष की अष्टमी से लेकर होलिका दहन तक होलाष्टक रहता है। इसके आठ दिनों तक कोई भी शुरू कार्य नहीं किए जाते। उन्होंने बताया कि शुभ कार्यों को इन दिनों में टालना ही बुद्धिमानी होती है। होलिका दहन के बाद रंगो का त्योहार मनाते हैं। जिस दिन से होलाष्टक प्रारंभ होता है होलिका दहन के लिए प्रतीक स्वरूप कुछ बांस स्थापित किए जाते हैं। इसके पश्चात सूखी लकड़ियों का ढेर लगाकर होली जलाई जाती है। 

होली भस्म से दूर होती हैं अशुभ शक्तियां
चित्रकूट। होलिका दहन के पश्चात बची हुई अग्नि और भस्म को अगले दिन घर में लाने से अशुभ शक्तियों से बचाने में सहयोग मिलता है। इस भस्म का शरीर पर लेपन भी किया जाता है। होली में धान को सेंक कर खाने से लोग निरोगी बन सकते हैं। यह जानकारी भागवताचार्य नवलेश दीक्षित ने दी है। 

डीएम-एसपी लेते रहे जायजा
चित्रकूट। होली पर्व शांतिपूर्ण निपटाने के लिए दिनभर पुलिस जवानों को गश्त करते देखा गया। यहां तक कि होमगार्ड व पीआरडी के जवानों को भी चैराहों पर तैनात किया गया था। जिलाधिकारी शेषमणि पाण्डेय व पुलिस अधीक्षक अंकित मित्तल ने प्रमुख स्थलों का निरीक्षण कर जायजा लिया। संबंधित थानाध्यक्षों को निर्देश दिया कि क्षेत्रों में भ्रमण कर शांति और सुरक्षा व्यवस्था कायम रखें।

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