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नकारात्मक सोच......

देवेश प्रताप सिंह राठौर
 ( वरिष्ठ पत्रकार)

आज आप सोचेंगे नकारात्मक सोच क्या और किसको कहा जाता है, नकारात्मक सोच वह है जो अच्छे कार्यों के बावजूद नकारात्मक सोच व्यक्ति या संस्था ,राजनीति पार्टी के रूप में व्याप्त हो जाती हैं। हमारी सकारात्मक और नकारात्मक सोच हमें क्या से क्या बना देती है मैं भी इस पर एक निश्चित जवाब नहीं दे सकता परंतु यह कह सकता हूं, कि लोग अपनी नाकामयाबी की वजह से स्वयं को किसी और को बता कर खुद एक बड़ा और सही साबित करने की कोशिश करता है ।परंतु ऐसा है नहीं हमारी असफलता की वजह हमें स्वयं और हमारा मस्तिष्क होता है जो गलत तरीके एवं योजनाओं को सोचता और बनाता है मैं आपको छोटी सी कहानी बताना चाहता हूं। हमारी एक गलती कैसे हमारे लाख अच्छा करने के बावजूद एक गलती जो गलती नहीं है, न्याय की बात करना वह आज तक सकारात्मक सोच बन जाती जबकि कार्यों में व्यवहारों में सकारात्मक है जैसे अलग-अलग व्यक्ति जैसे मानो एक का नाम दिनेश एक का नाम रमेश है दिनेश छोटा था और रमेश वड़ा पुत्र था तथा
उन दोनों में आपस में कभी नहीं बनती थी और सदा आपस में लड़ाई झगड़ा करते रहते थे, और अधिक लड़ाई झगड़ा रमेश किया करता था उसे बड़े छोटे की कोई सम्मान या इज्जत करना नहीं आता था ना ही कोई तहजीब उसको मालूम थी, परंतु अपने बड़े भाई के साथ कैसे बात करनी है और अपने माता-पिता से कैसे बात करनी है उसको संस्कार नहीं था ,आदर सत्कार कैसे करना है कोई भी संस्कार उसको व्याप्त नहीं था जबकि परिवार के लोग संस्कारी थे रमेश आए दिन झगड़ा किया करता था वह स्कूल जाने से लेकर घर आने तक एवं खाना खाने में रमेश झगड़ा करता था चाहे कोई भी कार्य हो रमेश की संगत खराब हो गई वह गलत संगत के कारण शराब एवं जुआ सब खेलता था शराब पीनी एवं गाली गलौज करना उसकी आदत बन चुकी थी शराब पीना सुबह से ही शुरू हो जाता था एक दिन उसकी अचानक शराब पीने के कारण मृत हो गई रमेश की मदद के बाद घर पर काफी परेशानी एवं पहाड़ टूट पड़ा क्योंकि मां के लिए सभी बच्चे बराबर होते हैं तथा मां बेटे की मृत्यु के कारण काफी चिंतित रहती थी, छोटा भाई दिनेश मेहनत से घर का खर्चा चलाने के लिए स्कूल में जाना बंद कर दिया और मजदूरी करने लगा दिनेश अकेला हो गया दिनेश की हिम्मत बांधी और प्रयास किया और अपनी बीमार मां का और घर का खर्चा चलाने का कार्य किया वह धीरे-धीरे प्रयासरत रहा और एक कंपनी में नौकरी करने लगा कहने का मकसद यह है व्यक्ति चाहे जितना अच्छा बनने पर जब किसी व्यक्ति के साथ उस व्यक्ति को जोड़कर गलत सोचा जाता है उस स्थिति में सोच नकारात्मक बन जाती है ।उस स्थिति में उसे बदलना मुमकिन नहीं क्योंकि उसके द सभी कार्य अच्छे हो परंतु उस व्यक्ति से एक प्रतिशत कार्य गलत हो जाए  तो 99% भी अच्छा कार्य खराब की श्रेणी में आ जाते हैं ।आप समझ सकते हैं जब व्यक्ति की सोच बदले कार्य बदले पर जो ठप्पा पुराना लग जाता जो ठीक होते हुए भी उसे नकारा  तो कुछ लोग अपने स्वार्थ में उसे खराब बना देते हैं उसे हटाना संभव नहीं होता आज के मानव को क्योंकि जब एक धारा में सब भ्रष्ट कहने लगे तब समझो सरकार में अपने स्वार्थ में अंधे हो गए हैं उन्हें समझना बड़ा मुश्किल है जब व्यक्ति अपने लाभ में किसी को दोषी ना होते हुए भी दोषी बना देता है इस स्थित में उट यह गंभीर होती है परंतु समाज देश हम आप सब यही मानते जानते चले आए हैं आज कार्य को महत्व कम दिया जाता है सिर्फ जो चमचों का ही आज पूरा देश जानता राजनीति या संस्था या कोई भी व्यवस्था हर जगह एक प्रणाली बन गई वहीं मस्ती मौज में रहेंगे जो चमचे के साथ अपनी स्थित को संभाले रहेंगे बाकी लोग परेशान रहेंगे यह आज की स्थिति बन चुकी है तथा जो ईमानदार होगा वह परेशान होगाआज जो लोग आपके बारे में अच्छा सोचते हैं लेकिन वह अच्छा सोचने के साथ आपके प्रति आपको लाभ की स्थिति ना लाने हेतु आपके प्रति नकारात्मक सोच रखते हैं

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