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प्रभु श्रीराम के केवट का निहोरा देख गंगा मइया हुई हर्षित

ग्राम हीरापुर में चल रही श्रीमद् भागवद कथा का छठवां दिन 

कालपी (जालौन), अजय मिश्रा । वृन्दावन धाम से पधारे वालयोगी महा मण्डलेश्वर पीठाधीश्वर आचार्य श्री स्वामी सत्यात्मानन्द गिरि जी महाराज ने भक्तों को श्रीमद् भागवद ग्रंथ व राम चरित मानस के केवट संवाद का रहस्यमय ढंग से सार समझाते हुये कहा कि भगवान के मधुरतम प्रेम रस का छलकता हुआ सागर है। गागर में सागर को भरते हुये कहा कि भगवान का अहंकार ही भोजन है जिसे हम आप को धनवैभव में अंहकार उत्पन्न करते उनका सदैव भगवान अंहकार चूर करता है। 
    सुविख्यात, विद्धान आचार्य श्री स्वामी सत्यात्मानन्द गिरि जी महाराज ने भगवान वेदव्यास की पावन जन्म भूमि के निकट ग्राम हीरापुर में स्थित फरारी बाबा स्थान में श्रीमदभागवद कथा के छठे दिवस में कथा पंडाल में उपस्थित हजारों भक्तों, श्रृद्धालुओं, श्रोताओं को अपने मुखारिविन्दु से रसपान कराते हुये भगवान कृष्ण की बाल
भक्तों को भागवत कथा सुनाते स्वामी सत्यात्मानन्द गिरि।
लीलाओं, गोबरधर पूजा, कृष्ण- रुकमणि विवाह आदि का विस्तृत वर्णन किया। रात्रि को श्री आचार्य ने केवट संवाद का विस्तार से वर्णन करते हुये सुनाया कि ’’मागी नाव न केवटु आना। कहइ तुम्हार मरमु मै जाना।। चरन कमल रज कंहु सबु कहई। मानुष करनि मूरि कछु अहइ।।’’ श्रीराम जी ने केवट से नाव मांगी पर वह लाता नही है केवट कहने लगा हे प्रभु मैने तुम्हारा मर्म जान लिया तुम्हारे चरण कमलों की धूल से स्पर्श मात्र से पत्थर भी मनुष्य बन जाता है। इस लिये प्रभु हम पहले पावं पखारेगे फिर नाव में चढ़ाकर गंगा पार उतारेगे। केवट की सभी शर्ते स्वीकार करके प्रभु श्रीराम केवट से पावं पाखाने के लिये सहमति देते है। ’’पद नख निरखि देवसरि हरषी। सुनि प्रभु बचन मोहं मति करषी।। केवट राम रजायसु पावा। पानि कठवता भरि लेइ आवा।। प्रभु के इन बचनो को सुनकर गंगा जी की बुद्धि मोह से खिंच गई थी कि ये साक्षात भगवान होकर भी पार उतारने के लिये केवट का निहोरा कैसे कर रहे है परन्तु समीप आने पर अपनी उत्पत्ति के स्थान परनखों को देखते ही उन्हे पहचानकर देव नदी गंगाजी हर्षित हो गई वे समझ गई कि भगवान नरलीला कर रहें है इससे उनका मोह नष्ट हो गया और इन चरणें का स्पर्श प्राप्त करके मैं धन्य हो जाऊगी यह विचार कर वे हर्षित हो गई केवट प्रभु श्रीराम की आज्ञा पाकर कठौते में जल भरकर ले आया और अत्यन्त आनंद व प्रेम में उमंगकर वह प्रभु के पैर धोने लगा। और चरणों को धोकर स्वयं सारे परिवार सहित उस चरणोदक को पीकर पहले अपने पितरों को भवसागर से पार कर फिर आनंदपूर्वक प्रभु श्रीराम, जानकी सीता, लक्ष्मण को अपनी नांव में बैठा कर गंगा से पार किया। इस कथा को सुन श्रोतागण भाव विभोर हो गये।

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