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श्रीकृष्ण जन्मोत्सव सुन श्रोता हुए मंत्रमुग्ध

चित्रकूट, सुखेन्द्र अग्रहरी । श्रीमद् भागवत कथा के चैथे दिन कथा प्रवक्ता प्रदीप आचार्य ने भगवान श्रीकृष्ण जन्म की कथा रसपान कराया। कथा के दौरान नंद घर आनंद भयो, जय कन्हैया लाल के सजीव दृश्य से श्रोता मंत्रमुग्ध रहे।
सीतापुर सेठ बगिया के पूर्व न्यू कालोनी स्थित सुरेश द्विवेदी के आवास में चल रही श्रीमद् भागवत कथा के चैथे दिन कथा व्यास प्रदीप आचार्य ने कहा कि जीवन का मंथन ही समुद्र मंथन है। जिस प्रकार समुद्र मंथन से नवरत्नों के साथ लक्ष्मी और हलाहल भी निकला था, उसी प्रकार जीवन का मंथन करने जीव का कल्याण होता है, लेकिन हलाहल से सुरक्षित रहने के भी उपाय साथ रहने चाहिए। उन्होंने बताया कि उक्त क्रियाकलाप से बचपन सत्य से बीतेगा और जवानी पवित्र आचरण से गुजरेगी तो बुढ़ापा जरूर सुंदरम रहेगा। कथा व्यास ने बताया कि
हर पल परमात्मा की स्मृति ही जीवन का मुख्य उद्देश्य होना चाहिए। जीवन का सूत्र बताते हुए कहा कि विकास के लिए विपत्ति भी अनिवार्य है। उसी तरह जीवन में पराजय भी जरूरी है। अन्यथा की स्थिति में मानव अहंकारी हो जाता है। समझा कर बताया कि अहंकार भगवान का भोजन है। प्रहलाद चरित्र पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह चरित्र पवित्र बालक का है। जिसका संस्कार गर्भ से हुआ। गर्भाधान एक संस्कार है जो पवित्र संतान को जन्म देता है। 16 संस्कारों में पहला संस्कार यही है। बताया कि चमड़ी चाट कर दैत्य पैदा हो सकते हैं, देव नहीं। अच्छी संतान के लिए माता-पिता को जन्म से शुद्ध रहना पडता है। कथा प्रवाह में आचार्य ने कहा कि आज के परिवार में सम्पत्ति को ही अधिक महत्व दिया जाता है संस्कार को नहीं। भारत देश संस्कार प्रधान है। उन्होंने श्रीकृष्ण जन्म के पूर्व श्रीराम कथा सुनाते हुए राम और श्रीकृष्ण को पूर्ण अवतार बताया। कथा के दौरान नंद घर आनंद भयो, जय कन्हैयालाल आदि बधाईयां गीत गाते समय श्रोतागण नाचते-थिरकते हुए मंत्रमुग्ध रहे। इस मौके पर यजमान श्रीमती प्रेमा द्विवेदी, सियाराम दुलार द्विवेदी के अलावा सैकडों श्रोतागण मौजूद रहे। आरती के बाद प्रसाद वितरित किया गया।

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