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जिला अस्पताल के कर्मचारियों की मिलीभगत से निजी एम्बुलेंस वाले चमका रहे अपना धंधा

उरई (जालौन), अजय मिश्रा । जिला अस्पताल में निजी एम्बुलेंस वाले सक्रिय हैं,जो अस्पताल के कुछ कर्मचारियों की मिलीभगत से अपना धंधा चमका रहे हैं। जिला अस्पताल वार्डों के अंदर से लेकर बाहर तक प्राइवेट एंबुलेंस संचालकों का खेल चल रहा है। न केवल उन्होंने जिला अस्पताल के परिसर पर कब्जा जमा रखा है, बल्कि यहीं से वह अपने दलालों के माध्यम से मरीजों को मनमाने किराये पर वाहन उपलब्ध करा रहे हैं। नियमानुसार जिला अस्पताल के परिसर में केवल सरकारी और 108 एम्बुलेंस ही खड़ी रह सकती हैं। निजी एम्बुलेंस को अस्पताल परिसर के अंदर अपने वाहन खड़े करने और मरीजों को ढूंढने की इजाजत नहीं है, लेकिन काफी समय से यहां निजी एम्बुलेंस वाले सक्रिय हैं, जो जिला अस्पताल के कुछ कर्मचारियों की मिलीभगत से अपना धंधा चमका रहे हैं ।
अस्पताल गेट के बाहर खड़ी प्राइवेट एम्बुलेंस गाड़ियां।
सूत्रों कि माने तो किसी मरीज को बाहर रेफर होने की जरूरत पड़ती है, तो अस्पताल के ही कुछ कर्मचारी मरीज के परिजनों को समझा बुझाकर उन्हें प्राइवेट एम्बुलेंस संचालकों के हवाले कर देते हैं। इसके बाद फिर एम्बुलेंस चालक मरीजों के परिजनों से मनमाना किराया वसूलते हैं, और कभी-कभी तो यह निजी एम्बुलेंस वाले मरीजों को ले जाकर सेटिंग वाले अस्पतालों में पहुचा देते हैं। जिसमे अस्पताल कर्मचारियों से लेकर एम्बुलेंस वालों तक का कमीशन सेट रहता है। जिला अस्पताल में खड़ी हो रही कई प्राईवेट एम्बुलेंसों में आवश्यक सुविधाएं तक नही हैं। कईयों में न तो लाइफ सपोर्ट सिस्टम है, और न ही पैरामेडिकल स्टाफ की सुविधा है। जिसकी वजह से मरीजों को परेशानी का सामना करना पड़ता है। कभी-कभी तो मरीजों को जान तक गवानी पड़ती है। एक ओर शासन जहां लाइफ सपोर्ट सिस्टम वाली बड़ी एम्बुलेंस सेवा संचालित कर रही है, तो वहीं निजी एम्बुलेंस वाले ज्यादातर ओमनी वैन व शूमो जैसी छोटी गाड़ियों के माध्यम से एम्बुलेंस सेवा प्रदान कर रहे हैं। जिससे मरीजों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है, और अस्पताल प्रशासन मौन साधे हुए हैं।

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