Latest News

मधुमक्खी शहद के अलावा फसल उत्पादन में भी सहयोगी

सेवानिवृत्त शिक्षक ने तोड़ी परम्परायें

हमीरपुर, महेश अवस्थी । सेवानिवृत्त शिक्षक ने बागवानी के साथ मधुमक्खी पालन की शुरूआत की तो गांव वाले उसकी थीम को नही समझ पाये, मगर समय रहते उसने साबित कर दिया कि परम्परागत खेती के अलावा बहुत कुछ किया जा सकता है और उससे अच्छी खासी कमाई भी हो सकती है। राठ क्षेत्र के बसेला गांव निवासी गयाप्रसाद 2010 वर्ष में सेवानिवृत्त हुए। उनकी बसेला के अलावा गोहाण्ड ब्लाक के धनौरा गांव में भी जमीन है। उन्होने अमरूद का बाग लगाया, फिर मोबाइल मे नेट के जरिये मधुमक्खी पालन का तरीका सीख कर शुरूआत
की। अब गांव के लोग शिक्षक से सीख हासिल कर रहे है। उनकी प्रेरणा से गांव में एक दर्जन अमरूद के बाग लग चुके है। वें मधुमक्खी पालन के प्रेरणा श्रोत बने है। बीते साल फरवरी माह में छत्तीसगढ़ से 150 बाक्स मंगवायें जिनसे छत्ते बढाकर उन्होने अलग से बाक्स बनवाकर इनकी संख्या 300 कर ली। सरसों की फसल के दौरान उन्होने चालीस कुंटल शहद निकाला है। बाक्स खरीदने में उनका 4.5 लाख रूपया खर्च हुआ व अन्य खर्च मिलाकर 10 लाख खर्च कर डाला। वें अब तक 20 लाख रूपये का शहद बेंच चुके है। चार माह में उन्हे दस लाख का लाभ हुआ। अब पड़ोसी गांव के किसान उनकी तकनीक को देखने आ रहे है। इस समय उत्पादन नही हो रहा है। मगर तिल की फसल आते ही शहद का उत्पादन बढ जायेगा। मधुमक्खी से परागण के जरियें 10 से 20 फीसदी उत्पादन बढ़ जाता है। यानी की मधुमक्खी शहर के अलावा फसल उत्पादन में भी सहयोगी है। 

No comments