Latest News

समाजवाद एक छलावा, आज का तनावबाद.......................

 (देवेश प्रताप सिंह राठौर,आमजा भारत)

आज हम सब  समाजवाद की बात करते हैं पर एक बात समझ में नहीं आती है समाजवाद है क्या क्या समाजवाद शिक्षा में भेदभाव कराता है जिससे  हम आरक्षण के रूप में भी कह सकते हैं दस लाख वेतन पाने वाला  आरक्षण में आता है और सवाल यह है एक हजार महीने पाने वाला स्वर्ण आरक्षण में नहीं आता यह व्यवस्था है इस देश की जाने हैं और पहचाने  वस्थानीय कॉलेज में अर्थशास्त्र के एक प्रोफेसर ने अपने एक बयान में कहा  "उसने पहले कभी किसी छात्र को फेल नहीं किया था, पर हाल ही में उसने एक पूरी की पूरी क्लास को फेल कर दिया है, क्योंकि उस क्लास ने दृढ़तापूर्वक यह कहा था कि "समाजवाद सफल होगा और न कोई गरीब होगा और न कोई धनी होगा" क्योंकि उन सब का दृढ़ विश्वास है कि यह सबको समान करने वाला एक महान सिद्धांत है.....

तब प्रोफेसर ने कहा– "अच्छा ठीक है ! आओ हम क्लास में समाजवाद के अनुरूप एक प्रयोग करते हैं- सफलता पाने वाले सभी छात्रों के विभिन्न ग्रेड (अंकों) का औसत निकाला जाएगा और सबको वही एक काॅमन ग्रेड दिया जायेगा। "पहली परीक्षा के बाद.....सभी ग्रेडों का औसत निकाला गया और प्रत्येक छात्र को B ग्रेड प्राप्त हुआl
जिन छात्रों ने कठिन परिश्रम किया था वे परेशान हो गए और जिन्होंने कम पढ़ाई की थी वे खुश हुए l
दूसरी परीक्षा के लिए कम पढ़ने वाले छात्रों ने पहले से भी और कम पढ़ाई की और जिहोंने कठिन परिश्रम किया था, उन्होंने यह तय किया कि वे भी मुफ़्त का ग्रेड प्राप्त करेंगे और उन्होंने भी कम पढ़ाई की l
दूसरी परीक्षा में ...... सभी का काॅमन ग्रेड D आया lइससे कोई खुश नहीं था और सब एक-दूसरे को कोसने लगे।जब तीसरी परीक्षा हुई.... तो काॅमन ग्रेड F हो गया l
जैसे-जैसे परीक्षाएँ आगे बढ़ने लगीं, स्कोरकभी ऊपर नहीं उठा, बल्कि और भी नीचे गिरता रहा। आपसी कलह, आरोप-प्रत्यारोप, गाली-गलौज औरएक-दूसरे से नाराजगी के परिणाम स्वरूप कोई भी नहीं पढ़ता था, क्योंकि कोई भी छात्र अपने परिश्रम से दूसरे को लाभ नहीं पहुंचाना चाहता था lअंत में सभी आश्चर्यजनक रूप से फेल हो गए और प्रोफेसर ने उन्हें बताया कि  इसी तरह *समाजवाद की नियति भी अंततोगत्वा फेल होने की ही है, क्योंकि इनाम जब बहुत बड़ा होता है तो सफल होने के लिए किया जाने वाला उद्यम भी बहुत बड़ा करना होता है l
परन्तु जब सरकारें मेहनत के सारे लाभ मेहनत करने वालों से छीन कर वंचितों और निकम्मों में बाँट देगी, तो कोई भी न तो मेहनत करना चाहेगा और न ही सफल होने की कोशिश करेगा l"उन्होंने यह भी समझाया कि -  इससे निम्नलिखित पाँच सिद्धांत भी निष्कर्षित व प्रतिपादित होते हैं -यदि आप राष्ट्र को समृद्ध और समाज को को सक्षम बनाना चाहते हैं, तो किसी भी व्यक्ति को उसकी समृद्धि से बेदखल करके गरीब को समृद्ध बनाने का क़ानून नहीं बना सकते।
जो व्यक्ति बिना कार्य किए कुछ प्राप्त करता है, तो वह अवश्य ही अधिक परिश्रम करने वाले किसी अन्य व्यक्ति के इनाम को छीन कर उसे दिया जाता है।सरकार तब तक किसी को कोई वस्तु नहीं दे सकती जब तक वह उस वस्तु को किसी अन्य से छीन न ले, आप सम्पदा को बाँट कर उसकी वृद्धि नहीं कर सकते।जब किसी राष्ट्र की आधी आबादी यह समझ लेती है कि उसे कोई काम नहीं करना है, क्योंकि बाकी आधी आबादी उसकी देख-भाल जो कर रही है और बाकी आधी आबादी यह सोच कर ज्यादा अच्छा कार्य नहीं कर रही कि उसके कर्म का फल किसी दूसरे को मिलना है, तो वहीं से उस राष्ट्र के पतन और अंततोगत्वा अंत की शुरुआत हो जाती है। जब कोई व्यक्ति बहुत अच्छा कार्य करता है और क्वालिफिकेशन भी उसकी अच्छी होती है उस जगह आरक्षण की मार एवम् समाजवाद से वह चोटिल होता है तो घाव अंदर तक होता है। जो अनुभवहीन है उनके पास कोई अनुभव नहीं है उनके अधीनस्थ कार्य करते हैं। उस समय  एहसास होता है समाजवाद एवम् समाजवादी बताने वाले लोग समाजवाद की भाषा में क्या कर रहे हैं और स्पष्ट आज की राजनीति में दिखाई देता है। जब किसी संस्था में या किसी कार्यालय में या किसी उद्यान में जब एक धारणा बन जाती है कि हम छोटे कर्मचारी के प्रत्यय न्याय कार्य सही होने के बावजूद भी करते आएंगे और करते रहेंगे तब यह धीरे धीरे ईश्वर की निगाहों में चढ़ जाता है और वहीं से उस संस्था उस उद्यान उस व्यापारी संगठन का पतन का रास्ता धीरे-धीरे तय होता है आज आप समझ लीजिए बहुत से संस्थान ऐसे हैं जहां पर छोटे कर्मचारी आज भी आहत है अथक मेहनत के बावजूद भी उन्हें फल नहीं मिल रहा है जिस पल के चाटुकार लोग बिना मेहनत के पा रहे हैं क्यों जब हम चाहते हैं कर्म प्रधान है कर्म करो मुख्य रूप से हम लोग मानते हैं उस रिश्ते पर हम कर्म को महत्व देते हुए उसकी श्रेणी को क्यों प्रोत्साहित करके उसे अच्छे पदो पर नहीं रखते आज हम देखते हैं समाजवादी की बात करने वाले लोग समाजवाद से बहुत दूर है जब एक छोटा सा कर्मचारी अथक मेहनत करता है और छोटा कर्मचारी जिस अधिकारी के अधीनस्थ कार्य करता है वह  अधिकारी जोलिख देता है वह पत्थर की लकीर हो जाती है क्यों सिर्फ इसलिए लिख देता है कि उसके पास एक इमानदारी है और चमचा रही तो व्यक्त है जिस कारण हो परेशान रहता है परेशान किया जाता है उसका लिखा हुआ श्रेणी से श्रेणी से श्रेणी वही आगे बढ़ता रहता है और छोटा कर्मचारी चलाता रोता रहता है किस तरह से मानसिक रूप से स्वस्थ होगा आप ऐसा जितना भी दे जब तक व्यक्ति मानसिक रूप से स्वस्थ हो और अच्छा लाभ का भागीदार नहीं होगा तब तक हो डिप्रेशन का शिकार पता रहेगा आज वही स्थिति और सी जगह में उत्पन्न है है पर कोई जानने का प्रयास नहीं करता है। आज ऐसी धारणा  बहुत सी संस्थानों में बनी हुई है इस पर कोई ध्यान नहीं देता हमारा समाजवाद कैसे अच्छा होगा जब हमारे समाज के बीच लोग दुखी होंगे। तथा जो समाजवादी की बात करते हैं कैसे समाजवाद सुखी है रह सकेगा सब लोग न्याय से वंचित रहेंगे।

No comments