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मंदाकिनी की अविरल धारा गंदगी के आगोश में

अधिकारियों की लापरवाही से हो रही प्रदूशित  
  कैसे पूरा होगा स्मार्ट सिटी का सपना 

चित्रकूट, ललित किशोर त्रिपाठी । दिगम्बर अखाडे के मंहत दिब्य जीवन दास महराज ने आज पत्रकारो से बताया कि मां मंदाकिनी की अविरल धारा लाखों लोगों के जीवन की रक्षा कर रही है, उनकी प्यास बुझा रही है। उदगम स्थल सती अनुसुइया से लेकर रामघाट तक जाने मंदाकिनी में कितने अवरोध हैं यह अवरोध किसके आदेश से बने यह कोई नही बता पा रहा है। मध्य प्रदेश की सीमा में ग्रामोदय विश्वविद्यालय के पीछे की हनुमान धारा वाली रोड पर बने पुल का मलबा मंदाकिनी मे डाल दिया गया है। जिस कारण वहां पर बालू, पत्थर तथा मिट्टी के अनावश्यक जमाव से मंदाकिनी का स्वरूप एक साधारण नाले की तरह हो गया है। यद्यपि इसका पाट बहुत चैड़ा है। 
इसी तरह आरोग्यधाम के पास तो स्थिति और भी गंभीर चिन्ताजनक है। यहां पर मंदाकिनी में स्वीमिंग पूल ही बना दिया गया है। वहां पहुंचने पर लगता ही नहीं है कि यह वही मंदाकिनी नदी है जिसको प्राणदायनी व मोक्षदायनी बनाकर अपने जीवन की सम्पूर्ण तपस्या के प्रतिफल स्वरूप माता अनुसुइया एवं महात्मा अत्रि मुनि ने इस भू-भाग के लोगों के कल्याण के लिये अवाहित कर इस क्षेत्र में स्थापित किया। महत जी ने बताया कि पूर्व मुख्य मंत्री शिवराज सिंह जब भी चित्रकूट आये तब तब यहां तमाम घोषणाये कर गये लेकिन उन पर अमल आज तक नही हो पाया आगे बताया कि चित्रकूट की धरती का तथा यहां के वासियों का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह रहा है कि यह क्षेत्र और यहां के लोग दो प्रदेशों की सरकारों की आपसी रस्साकसी का शिकार होते रहे हैं एवं पिसते रहे हैं। 
गनीमत है कि उत्तर-प्रदेश सरकार ने चित्रकूट को जिला का दर्जा दिया हुआ है, किन्तु मध्य-प्रदेश में तो अभी भी चित्रकूट सिर्फ एक नगर पंचायत ही बना हुआ है। जिस कारण यहां के लोगों को छोटे -बड़े सभी कार्यों के लिये सतना भागना पड़ता है। जिस कारण उनका समय और धन बर्बाद होता है।चित्रकूट में सामाजिक  संगठनों द्वारा समय-समय पर मंदाकिनी को लेकर कई अभियान चलाये गये, किन्तु सरकारों पर तो जैसे इन सबका कोई असर ही नहीं होता दिख रहा है। तभी तो मां मंदाकिनी के प्रति जो संवेदनशीलता दिखनी चाहिये, वह सही  मायने में बिल्कुल दिखाई नहीं दे रही है, और फिर लोगों का क्या..? इन्हें तो सदा ही बहती गंगा में हाथ धोने का अवसर चाहिये। चित्रकूट विकास के नाम पर स्वीकृत योजनायें प्रयुक्त होते-होते उनकी दिशा एवं स्वरूप बदल जाते हैं। सरकारों के उच्च प्रशासनिक अधिकारियों के बीच में बैठकर  समाजसेवी एवं बुद्धिजीवी योजना बनाते हैं, किन्तु प्रयोग में केवल ठेकेदारों के लाभ वाली योजनायें बदले हुये स्वरूप में क्रियान्वित होती हैं।मंदाकिनी तटों के किनारे वृक्षारोपण एवं प्राकृतिक सौन्दर्य विकसित करने की जगह पक्के घाटों, पुलों एवं किनारे -किनारे सड़कों का निर्माण किया जा रहा है। जिस कारण अतिक्रमण और भी तीव्र हो गया है। बाद में लड़ाई लड़कर सामाजिक कार्यकर्ता इन्हें हटाने की मांग करते हैं। कितना अच्छा हो कि योजनायें दूरदर्शिता के साथ बनाई जायें योजनायें बनाते समय दूरदर्शिता के साथ उनकी दीर्घकालिकता का भी विचार किया जाता। साथ ही तैयार योजनाओं को क्रियान्वित करते समय स्थानीय रूचि रखने वाले स्वयंसेवी संगठनों की भी सलाह ली जायेगी। 

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