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रामायण मेला में प्रवचनों से रामकथा की बताई महिमा

चित्रकूट, सुखेन्द्र अग्रहरी । भगवान राम की साधना स्थली चित्रकूट में राष्ट्रीय रामायण मेला के चैथे दिन डा तीरथदीन पटेल ने बताया कि माता कैकेयी ने विधवा होने पर भी राष्ट्र को एकसूत्र में बांधा है। बताया कि राम का वनवास काल राष्ट्र का सुधारक काल कहा जाये तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। उन्होंने माता कैकेयी को राष्ट्र की नायिका बताया। राम के वनवास काल में राक्षसों का विनाश होने के साथ ही योगी तपस्वी, ऋषि मुनियों के संकट दूर हुए थे। तभी विश्व में रामराज्य आया था। रामराज्य लाने की प्रथम श्रेष्ठता माता कैकेयी ही हैं। चित्रकूट की महिमा का बखान करते हुए डा पटेल ने कहा कि यहां का एक-एक कण राममय, यहां की रज भगवान का प्रसाद रूप और धूल माथे का तिलक है। कामदगिरि की परिक्रमा के बारे में बताया कि परिक्रमा स्थल की धूल सुहागिन स्त्रियों का सिंदूर और पुरुषों के माथे का शीतल चंदन है। प्रयागराज से पधारे डा सीताराम सिंह
‘विश्वबंधु’ ने रामचरितमानस को जीवन जीने का संविधान बताया। वहीं इसे मर्यादा ग्रंथ भी बताया। कोमल द्विवेदी कवियत्री ने कविता के माध्यम से चित्रकूट की महिमा का वर्णन किया। मप्र सतना के कथा व्यास रामविश्वास तिवारी ने ‘अनुचित उचित विचार तजि, जे पालहिं पितु बैन’ का संदर्भ देते हुए माता, पिता और गुरु की सेवा को सबसे बड़ा धर्म बताया। रामकथा व्यास रामभरोसे तिवारी ने आनंद की व्याख्या करते हुए ईश्वर के प्रति सच्चे प्रेम को ही आनंद बताया। जम्मू-कश्मीर से पधारे सनातन संस्कृति के प्रकाण्ड विद्वान तथा वल्र्ड आॅर्गेनाइजेशन के कार्यकता डा मसूद इकबाल ने सारी मानवता को प्रेम, भाईचारे और एकता का संदेश दिया। कहा पेड़, पत्ते और डालें तक परेशान हो जायेंगी जिस दिन परिंदे हिन्दू और मुसलमान हो जायेंगे। उन्होंने बताया कि वेद और कुरान के आधार पर एकता के विषय में बताया कि संपूर्ण मानवता एक पिता की संतान है। एक खुदा के सब बंदे हैं एक आदम की सब संतान। तेरा मेरा खून का रिश्ता मैं भी सोचूं तू भी सोच प्यार का शबनम हर आयत में प्रेम का अमृत हर श्लोक फिर क्यों इंसान खून का प्यासा। उन्होंने ऋगवेद की चर्चा करते हुए कहा कि ‘महो दिवः प्रथिव्याश्च सम्राट्’ अर्थात् ईश्वर विशाल आकाश और पृथ्वी का सर्वोच्च शासक है। और ‘भूतस्य जातः पतिः एक आसीत्’ अर्थात् ईश्वर पैदा किए गए सारे संसार का एक और अकेला स्वामी है। उन्होंने बताया कि ‘ईक्म् ब्रम्हा द्वितीय नास्तेः नहे ना नास्ते किंचन’ अर्थात् ईश्वर एक ही है दूसरा नहीं है। सुल्तानपुर से आए डा कृष्णमणि चतुर्वेदी ‘मैत्रेय’ ने बड़भागी शब्द की विवेचना करते हुए मानव से इतर प्रथम श्रेणी में कागभुशुंडी जी को अत्यन्त बड़भागी बताया। जग कोउ नहिं तुम सम बड़भागी। सीता हरण दो विभूतियों ने अपनी आंखों से देखा था। जिनमें सुग्रीव एवं जटायु हैं। शक्ति सम्पन्न होते हुए भी सुग्रीव नारी की मदद के लिए आगे नहीं बढ़े जबकि जटायु जी चुनौती देते हुए बढ़े ‘सीते पुत्रि करसि जनि त्रासा। करिहौं जातु धान कर नासा। इसके बाद उन्होंने अहिल्या को बड़भागी कहते हुए यह सिद्ध किया कि जो श्रीराम के चरण को स्पर्श कर लेता है वही बड़भागी की श्रेणी में आता है। ‘हम सब सेवक अति बड़भागी, संतत राम चरन अनुरागी’। डा मैत्रेय ने ‘भूप सहस दस एकहिं बारा’ का तार्किक विवेचन करते हुए यह बताया कि दस हजार राजा एक साथ धनुष नहीं उठा रहे थे बल्कि एक ‘वर’ को छोड़कर शेष राजा थे इस संदर्भ में इस चैपाई का वर्णन हुआ है जैसे ‘वानर मनुज जाति दुइ बारे। मप्र के खण्डवा से पधारे रमेश चन्द्र तिवारी ने अरण्य काण्ड का प्रसंग वर्णित करते हुए नारी महत्ता की मीमांसा प्रस्तुत की। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि जहां नारी की पूजा होती है वहां लक्ष्मी का वास होता है। बंबई से पधारे पं वीरेन्द्र प्रसाद शास्त्री रामायणी ने राम नाम की महिमा का सप्रमाण बखान करते हुए बताया कि ‘यद्यपि प्रभु के नाम अनेका। एक ते अधिक एक ते एका। राम सकल नामं ते अधिका। होहु नाथ अघ खग गन बधिका। अर्थात् श्रीराम के नाम से बढ़कर दूसरा कोई नाम नहीं है। सनत कुमार मिश्र मानस किंकर ने हनुमंत लाल को एकादशवें रुद्र का अवतार बताया। लंका जलाने के समय रहा न नगर बसन घृत तेला। बाढ़ी पूंछ कीन्ह कपि खेला। कह कर जताया कि बुराई पर निश्चित रुप से अच्छाई की विजय होती है। बताया कि हनुमान जी श्रीराम के अनन्य उपासक है। 

रामकथा से राष्ट्र प्रेम और बलिदान की जगाई भावना

चित्रकूट। राष्ट्रीय रामायण मेला में राम के ऐतिहासिक काव्यों पर शोधपरक विद्वानों ने विचार व्यक्त किए। इसी क्रम में राम विनोद महाकाव्य के खोजकर्ता डा चन्द्रिका प्रसाद दीक्षित ‘ललित’ ने विद्वत गोष्ठी का संचालन करते हुए बताया कि 18वीं शताब्दी में रामकथा के क्षेत्र में एक परिवर्तन हुआ और वह परिवर्तन राष्ट्रीयता को लेकर किया गया। गुरु तेगबहादुर के बलिदान और गुरु गोविंद सिंह को महाकवि चंद ने दशम अवतार की संज्ञा दी है, कवि के शब्दांे में ‘अवतार कला दश आय लियो’ इस प्रकार समूचे देश में रामकथा के द्वारा राष्ट्र प्रेम और बलिदान की भावना जगाने का कार्य महाकवि चंद के द्वारा पूरा किया गया। रामचरितमानस की परंपरा में महाकवि चंद ने ‘राम विनोद’ नामक महाकाव्य की रचना संवत् 1804 में हसवां फतेहपुर में की थी। जिसमें कुल मिलाकर सात काण्ड हैं। और काण्डों के अंतर्गत अध्यायों की रचना की गई है। कुल 5 हजार 328 छंद हैं और इस महाकाव्य में वैदिक छंद, छप्पय छंद, दण्डक छंद, त्रिभंगी छंद, छंद गीतिका, कवित्त दोहा आदि छंदों का प्रयोग महाकवि केशव की रामचन्द्रिका की शैली में मिलता है। विद्वत सभा सत्र की अध्यक्षता करते हुए तिरुपति से पधारे ब्रह्मर्षि प्रो आरएस त्रिपाठी (तिरुपति स्वामी) ने अपने समापन वक्तव्य में कहा कि अब रामायण के लगभग छह काण्ड सम्पूर्ण हो चुके हैं। अब ‘‘राम-राम-राम महर्षि वाल्मीकि की इस उक्ति को सम्मान देते हुए हम सब रामकाज रुप अयोध्या में भव्य राममंदिर निर्माण के कार्य में पूर्ण रुप से संलग्न हो जायेंगे। ज्ञातव्य है कि ब्रह्मर्षि तिरुपति स्वामी भारत स्वाधीनता के अजेय आत्म बलिदानी क्रांतिकारी पंडित चंद्रशेखर आजाद (त्रिपाठी) के भतीजे हैं। अयोध्या के डा हरिप्रसाद दुबे ने बताया कि जीवन संस्कारों का देवता है। तुलसी बार-बार प्रीति की शुभी दृष्टि देते हैं। लोक की उपेक्षा पर तुलसी से अधिक किसी ने नहीं लिखा। माता का लोक पुराण जग प्रसिद्ध है। कौंच (पक्षी) क्रन्दन की संवेदना ने वाल्मीकि का सत्य जगाया। यातना दृष्टि देती है। गोस्वामी तुलसीदास के सम्मान से पुरस्कृत प्रयाग के डा0 सभापति मिश्र ने भगवान राम का चरित्र विश्व के लिए अनुकरणीय बताया। इनकी चैपाई सावर मंत्र की तरह प्रभावी हैं। प्राचीन काल में जब तंत्र, मंत्र, यंत्र द्वारा सिद्धि प्राप्त करने की स्वाथी। परंपरा प्रचलित हुई तब भगवान शंकर ने सभी मंत्रों को कीलित करके शक्ति समाप्त कर दी। कलयुग के दुखी जीवों को देख पार्वती के निवेदन पर भगवान शंकर ने राम के विराट स्वरुप की कल्पना की। सुरेन्द्र सिंह पूर्व प्रधानाचार्य बंादा ने बताया कि भगवान रामराज्य की स्थापना में जाति, धर्म, सम्प्रदाय के भेदभाव समाप्त होंगे। भदोही के डा उदयशंकर दुबे ने कहा कि बुंदेलखण्ड की चित्रकूट की धरती पर जहां मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने 11 वर्ष 6 माह 6 दिन साधनारत रहकर ऋषियों-मुनियों सहित दीन-दुखियों की सेवा कर साधना में सफलता हासिल कर लंका सहित समस्त राक्षसों का विनाश किया था। चित्रकूट की धरती पर साधक की साधना पूरी होती है। विद्वत गोष्ठी के दौरान रायबरेली से आईं डा0 चम्पा श्रीवास्तव की पुस्तकों निष्कंप दीपशिखा एवं विन्यास निबन्ध संग्रह का लोकार्पण प्रयाग विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर डा0 सभापति मिश्र द्वारा संपन्न हुआ। उन्होंने आध्यात्मिक तपोभूमि चित्रकूट की पावन रज का नमन करते हुए अपने व्याख्यान में कहा कि रामायण संस्कृति और संस्कार का सिंधु है। कहा कि राचरितमानस मानव जीवन की इनसाइक्लोपीडिया हैै जो मानव को जीवन जीने की कला सिखाता है। असम गुवाहाटी के डा देवेन चन्द्र दास ‘सुदामा’ ने कहा कि राष्ट्रीय रामायण मेला के माध्यम से देश में राष्ट्रीय एकता सुदृढ़ होगी। यहां केवल रामकथा ही नहीं अपितु देश के विभिन्न प्रांत की झलक देखने को मिलती है। जिसके माध्यम से देश की कला, संस्कृति का आदान-प्रदान भी होता है। 

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