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Thursday, January 23, 2020

महानायक सुभाष चंद्र बोस

देवेश प्रताप सिंह राठौर 
(वरिष्ठ पत्रकार )

जनवरी 23 देश के महानायक आजादी के कर्णधार सुभाष चंद्र बोस की जयंती मनाई जा रही है। लेकिन क्या आपको लगता है देश में इतने महान व्यक्ति जयंती जैसा माहौल कहीं दिखाई दे रहा है नहीं क्योंकि आजादी के बाद चाटुकार लोग ही इस देश में आजादी की है जो अंग्रेजों के चमचे रहे वही स्थित आज भी बनाई जा रही है लेकिन सरकार के मजबूत हौसले और सच्चे इरादे के कारण सब दबे हैं, क्योंकि जनता उनके साथ है देश में बहुत से महान विभूतियां हुई, जन्म हुआ लेकिन एक नाम सुभाष चंद्र बोस का रहा है सुभाष चंद्र बोस के साथ भी आजादी के बाद आज 74 साल के बाद भी न्याय की स्थिति नहीं बन पाई है । जिस व्यक्ति ने इतने बड़े-बड़े देश की आजादी के लिए कार्य किए हैं वह व्यक्ति आज भारत रत्न की मांग देश की युवा पीढ़ी करती आई है परंतु भारत रत्न तक नहीं मिल पाया वैसे देखा जाए सुभाष चंद्र बोस भारत रत्न के मोहताज नहीं है उनके पास 100 करोड़ भारतीय उनको भारत रत्न से भी बढ़कर देश की प्रथम आजादी का कर्णधार मानते है।सुभाष चंद्र के पिता एक सरकारी वकील थे और माँ का नाम प्रभावती देवी था। सुभाष ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा कटक में एंग्लों इंडियन स्कूल से ली और कलकत्ता विश्वविद्यालय, स्कॉटिश चर्च कॉलेज से दर्शनशास्त्र में स्नातक की डिग्री प्राप्त की।
वो एक बहादुर और महत्वकांक्षी भारतीय युवा थे जिसने सफलतापूर्वक आई.सी.एस परीक्षा पास होने के बावजूद अपनी मातृभूमि की आजादी के लिये देशबंधु चितरंजन दास द्वारा प्रभावित होने के बाद असहयोग आंदोलन से जुड़ गये। हमारी आजादी के लिये ब्रिटिश शासन के खिलाफ वो लगातार हिंसात्मक आंदोलन में लड़ते रहे।महात्मा गांधी के साथ कुछ राजनीतिक मतभेदों के कारण 1930 में कांग्रेस के अध्यक्ष होने के बावजूद उन्होंने कांग्रेस को छोड़ दिया। एक दिन नेताजी ने अपनी खुद की भारतीय राष्ट्रीय शक्तिशाली पार्टी ‘आजाद हिन्द फौज’ बनायी क्योंकि उनका मानना था कि भारत को एक आजाद देश बनाने के लिये गांधीजी की अहिंसक नीति सक्षम नहीं है। अंतत: उन्होंने ब्रिटिश शासन से लड़ने के लिये एक बड़ी और शक्तिशाली “आजाद हिन्द फौज” बनायी।वो जर्मनी गये और कुछ भारतीय युद्धबंदियों और वहाँ रहने वाले भारतीयों की मदद से भारतीय राष्ट्रीय सेना का गठन किया। हिटलर के द्वारा बहुत निराशा के बाद वो जापान गये और अपनी भारतीय राष्ट्रीय सेना को एक प्रसिद्ध नारा दिया दिल्ली चलो जहाँ पर आजाद हिन्द फौज और एंग्लों अमेरिकन बलों के बीच एक हिंसक लड़ाई हुयी। दुर्भाग्यवश, नेताजी सहित उन्हें आत्मसमर्पण करना पड़ा। जल्द ही, टोक्यो के लिये प्लेन में छोड़े गये हालांकि फारमोसा के आंतरिक भाग में प्लेन दुर्घटनाग्रस्त हो गया। ये रिपोर्ट किया गया कि उस प्लेन दुर्घटना में नेताजी की मृत्यु हो गयी। नेताजी का साहसिक कार्य आज भी लाखों भारतीय युवाओं को देश के लिये कुछ कर गुजरने के लिये प्रेरित करता है।नेताजी सुभाष चन्द्र बोस भारत के एक महान देशभक्त और बहादुर स्वतंत्रता सेनानी थे। वो स्वदेशानुराग और जोशपूर्ण देशभक्ति के एक प्रतीक थे। हर भारतीय बच्चे को उनको और भारत की स्वतंत्रता के लिये किये गये उनके कार्यों के बारे में जरुर जानना चाहिये। इनका जन्म 23 जनवरी 1897 को उड़ीसा के कटक में एक हिन्दू परिवार में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा उनके अपने गृह-नगर में पूरी हुयी थी जबकि उन्होंने अपना मैट्रिक कलकत्ता के प्रेसिडेंसी कॉलेज से किया और उन्होंने अपनी पढ़ाई कलकत्ता,विश्वविद्यालय के स्कॉटिश चर्च कॉलेज से दर्शनशास्त्र में ग्रेज़ुएशन पूरा किया। बाद में वो इंग्लैंड गये और चौथे स्थान के साथ भारतीय सिविल सेवा की परीक्षा को पास किया।अंग्रेजों के क्रूर और बुरे बर्ताव के कारण अपने देशवासियों की दयनीय स्थिति से वो बहुत दुखी थे। भारत की आजादी के माध्यम से भारत के लोगों की मदद के लिये सिविल सेवा के बजाय उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ने का फैसला किया। देशभक्त देशबंधु चितरंजन दास से नेताजी बहुत प्रभावित थे और बाद में बोस कलकत्ता के मेयर के रुप में और उसके बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गये। बाद में गांधी जी से वैचारिक मतभेदों के कारण उन्होंने पार्टी छोड़ दी। कांग्रेस पार्टी छोड़ने के बाद इन्होंने अपनी फारवर्ड ब्लॉक पार्टी की स्थापना की।वो मानते थे कि अंग्रेजों से आजादी पाने के लिये अहिंसा आंदोलन काफी नहीं है इसलिये देश की आजादी के लिये हिंसक आंदोलन को चुना। नेताजी भारत से दूर जर्मनी और उसके बाद जापान गये जहाँ उन्होंने अपनी भारतीय राष्ट्रीय सेना बनायी, ‘आजाद हिन्द फौज’। ब्रिटिश शासन से बहादुरी से लड़ने के लिये अपनी आजाद हिन्द फौज में उन देशों के भारतीय रहवासियों और भारतीय युद्ध बंदियों को उन्होंने शामिल किया। सुभाष चन्द्र बोस ने अंग्रेजी शासन से अपनी मातृभूमि को मुक्त बनाने के लिये “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा” के अपने महान शब्दों के द्वारा अपने सैनिकों को प्रेरित किया।
ऐसा माना जाता है कि 1945 में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की मृत्यु एक प्लेन दुर्घटना में हुयी थी। ब्रिटिश शासन से लड़ने के लिये उनकी भारतीय राष्ट्रीय सेना की सभी उम्मीदें उनकी मृत्यु की बुरी खबर के साथ समाप्त हो गयी थी। उनकी मृत्यु के बाद भी, कभी न खत्म होने वाली प्रेरणा के रुप में भारतीय लोगों के दिलों में अपनी जोशपूर्ण राष्ट्रीयता के साथ वो अभी-भी जिदा हैं। वैज्ञानिक विचारों के अनुसार, अतिभार जापानी प्लेन दुर्घटना के कारण थर्ड डिग्री बर्न की वजह से उनकी मृत्यु हुयी। एक अविस्मरणीय वृतांत के रुप में भारतीय इतिहास में नेताजी का महान कार्य और योगदान चिन्हित रहेगा। भारत की आजादी के महान विभूति सुभाष चंद्र बोस आज भी एक सौ करोड़ जनता के हृदय सम्राट है और हृदय सम्राट रहेंगे दुख आजादी के बाद उन लोगों से हैं जिन्होंने हमारे नेता सुभाष चंद्र बोस को पूर्ण सम्मान जिसके वह हकदार थे ,उन्हें नहीं मिला लेकिन एक दिन ऐसा आएगा जब सुभाष चंद्र बोस पूर्व से देश से सर्वोच्च पद के साथ सम्मानित होंगे तथा देश उन्हें आज भी उतना ही मानता है जितना उन्हें इस देश में किसी और को नहीं मानता क्योंकि सुभाष चंद्र बोस वह शख्सियत रहे हैं, जिनके बारे में कलम भी छोटी पड़ जाती है लिखने में स्याही सूख जाती है लेकिन लेखनी बंद नहीं होती है वह सुभाष चंद्र बोस के किस्से कहानी हकीकत रहीहै जो आज इतिहास बना कर हम आपके बीच में छोड़ दिया है।

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