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बेटियों को बढ़ावा देने की उठी गूंज

रैली निकालकर बालिकाओं के सशक्तिकरण का दिया सन्देश
बेहतर कल की निशानी हैं बेटियां डा. राकेश रमण    
राष्ट्रीय बालिका दिवस  

बांदा, कृपाशंकर दुबे । बेटियां हैं तो सब कुछ है, बेटियां ही बेहतर कल की निशानी हैं। लड़का-लड़की में भेद करने की बजाय हमें बेटियों को आगे बढ़ने का हौसला देना चाहिए। उनकी सेहत, पोषण व शिक्षा पर ध्यान देना चाहिए ताकि बड़ी होकर वे शारीरिक, आर्थिक, मानसिक और भावात्मक रूप से सशक्त बन सकें। समय आ गया है कि बरसों से अपने अधिकारों से वंचित रखी गई बालिकाओं को सम्मान, समानता और स्नेह मिले। यह सन्देश चिकित्सा, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण के अपर निदेशक डा. राकेश रमण ने शुक्रवार को राष्ट्रीय बालिका दिवस के अवसर पर मुख्य चिकित्सा अधिकारी कार्यालय से निकाली गई जागरुकता रैली में दिए। 
बांदा पैरामेडिकल कालेज एंड नर्सिंग स्कूल के विद्यार्थियों ने ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, लड़का-लड़की एक
रैली निकालतीं छात्राएं और रैली का शुभारंभ करते सीएमओ
समान आदि के नारे लगाते हुए रैली निकाली और बेटियों के समर्थन में गूूंज स्थापित की। मुख्य चिकित्सा अधिकारी डा. संतोष कुमार ने बताया कि प्रदेश में जन्म के समय का लिंगानुपात चिंता का विषय है, जिसका कारण गर्भस्थ शिशु, भ्रूण के लिंग की अवैध जांच कराना भी है। ऐसा करने वाले लोगों पर पीसीपीएनडीटी एक्ट (गर्भधारण पूर्व एवं प्रसव पूर्व निदान तकनीक अधिनियम 1994) के तहत कड़ी कार्यवाही की जाएगी। अवैध रूप से भ्रूण के लिंग की जांच करनेध् करवाने वाले व्यक्तियों की सूचना देने वाले व्यक्ति को शासन द्वारा पुरस्कार दिया जाएगा। ऐसे व्यक्तियों की पहचान के लिए जिले में मुखबिर योजना भी चलाई जा रही है। अपर मुख्य चिकित्साधिकारी डा. बीपी वर्मा ने बालिकाओं को प्रोत्साहन देने के लिए चलाई जा रही विभिन्न योजनाओं के बारे में जानकारी दी और अपील की कि हम सब मिलकर बेटियों को बढ़ावा दें और प्रदेश का लिंग अनुपात बेहतर करने में भागीदार बनें। कार्यक्रम में संयुक्त निदेशक डा. आरबी गौतम, उप-मुख्य चिकित्सा अधिकारी डा. एमसी पाल, मंडलीय कार्यक्रम प्रबंधक आलोक कुमार, आरआई एआरओ राधा शर्मा, बांदा पैरामेडिकल कालेज की डायरेक्टर जरीना खान, डीपीएम कुशल यादव, शहरी स्वास्थ्य समन्वयक प्रेम चन्द्र पाल व स्वास्थ्य विभाग के अन्य कर्मचारी मौजूद रहे।
 
कन्या-शक्ति की पहचान कराता है राष्ट्रीय बालिका दिवस

बांदा। चाहे लिंग अनुपात हो, शिक्षा या विवाह की उम्र, आंकड़े बताते हैं कि समाज में अभी भी बालिकाओं की स्थिति को बेहतर करने की जरूरत है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे-4 (एनएफएचएस-4, 2015-16) के आंकड़ों
के अनुसार जनपद में प्रति एक हजार पुरुषों पर 908 महिलाएं हैं। 61.8 प्रतिशत महिलाएं साक्षर हैं, जबकि 20 से 24 वर्ष की 18.8 प्रतिशत महिलाएं ऐसी हैं जिनकी शादी 18 वर्ष से कम की उम्र में हो जाती है। ऐसे में बालिकाओं को बोझ समझने वाले लोगों को सही मार्ग दिखाने और कन्या-शक्ति की पहचान करवाने के उद्देश्य से पूरे देश में हर साल 24 जनवरी को राष्ट्रीय बालिका दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन विभिन्न आयोजनों के द्वारा लड़कियों के सशक्तिकरण और लिंग आधारित समानता के लिए लोगों को जागरुक किया जाता है। 

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