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अरहर का उत्पादन केवीके लिये बना चुनौती पर एवार्ड के लिये रहा छटपटा

हमीरपुर, महेश अवस्थी । हमीरपुर में कृषि योग्य भूमि में सिर्फ दो फीसदी जमीन पर अरहर की फसल बोई जा रही है। सांख्यिकी विभाग के मुताबिक हर साल जिले का दलहन और तिलहन का क्षेत्रफल घटता जा रहा है। यही कारण है कि किसान मंहगा जीन्स का न तो उत्पादन 
कर पा रहा है और न ही बाजार में उसकी बिक्री कर पा रहा है। परिणाम स्वरूप उसकी आर्थिक दशा लगातार खराब होती जा रही है। शासन से जिस उद्देश्य से केवीके कुरारा की स्थापना की थी, उसका किसान को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पा रहा है। डेढ़ दशक बीत जाने के बाद भी यह केन्द्र किसानों को बीज उत्पादन की विधि नहीं बता पाया। किसान अभी भी दूसरों पर निर्भर है। यही कारण है कि जिले का उत्पादन लगातार गिरता जा रहा है। कृषि विज्ञान केन्द्र दलहन सीड हब का नेशनल एबार्ड पाने के लिये छटपटा रहा है। जो कि उसके लिये चुनौती बन गई है। चित्रकूट धाम मण्डल के चारों जिलों में दाल आपूर्ति अपनी पहचान थी। मगर 2005 में स्थापित केवीके किसानों को अपेक्षित लाभ नहीं दे पाया। इन जिलों में सफेद मटर, चना, मसूर पर ध्यान तो दिया जा रहा

है। मगर अरहर के उत्पादन की ओर ध्यान नहीं जा रहा है। यही कारण है कि कभी पड़ोसी राज्यों को दलहन की आपूर्ति करने वाला बुन्देलखण्ड खुद एक-एक दानें को तरस रहा है। नौ हेक्टेयर में स्थापित केवीके ने बीते साल 448 कुंतल बीज का उत्पादन किया जो बहुत कम है। जबकि लक्ष्य 1000 कुंतल उत्पादन कर रखा गया था। केन्द्र के प्रभारी डाॅ मुस्तफा का कहना है कि वह अरहर के लिये प्रत्यत्नशील हैं, मगर सफेद मटर उनकी पहली प्राथमिकता है। दूसरी प्राथमिकता में चना और मसूर की दाल आती है। केवीके वैज्ञानिक डाॅ प्रशान्त का कहना है कि अरहद की फसल की ओर ध्यान देना चाहिये, मगर सब्जी उत्पादन के लिये ध्यान दिया जा रहा है। बुन्देलखण्ड में अरहर सीट का हब हमीरपुर बन जाये तो इससे ज्यादा गौरव की बात क्या हो सकती है। भारत सरकार को भेजी रिपोर्ट में कहा गया है कि बुन्देलखण्ड में अरहर का उत्पादन नाममात्र का रह गया है। किसानों की दोगनी आय का सपना दिखाने वाले लोगों का ध्यान इधर क्यों नहीं जा रहा है।

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