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माही की महारथ को नकारा क्यों?

(देवेश प्रताप सिंह राठौर)
(वरिष्ठ पत्रकार)

विश्व में एक नाम क्रिकेट जगत के प्रेमियों में हमेशा बना रहा जो नाम महेन्द्र सिंह धोनी (माही) के नाम से जाने जाते हैं जब क्रिकेट कहीं विश्व में किसी देश का हो परंतु हर देश माही के किक्रेट कैप्टन का दिवाना रहा था जिसने अपनी कप्तानी में बहुत से मैच जिताये तथा 2007 में 20/20 मैच विश्व कप तथा 2011 में विश्व कप जैसी उपलब्धियां देने वाला माही की महारथ को आज भारतीय क्रिकेट बोर्ड अपनी राजनीति में और अपने ईगो में आज इस महान खिलाड़ी का अपमान कर रही है। आखिर ऐसा क्यों क्या महेन्द्र सिंह धोनी की कामयाबी देश के लिये कम है उन लोगों के लिए जो चयन समिति महान खिलाड़ी को नकार रहे है। वहीं पर क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले सचिन तेन्दुलकर को जब तक खेलने दिया गया जब तक वह खेले तथा उनकी मर्जी पर रहा क्या धोनी की उपयोगिता कम रही यह कोई धोनी ही नहीं। इस तरह का चयन समिति वीसीजीआई का व्यवहार रहा। भेदभाव की मार से राहुल प्रवीण एवं सौरभ गांगुली जो आज क्रिकेट के अध्यक्ष है। वह भी चयन समिति के व्यवहार से ग्रस्त रहे तथा खेल बकाया था इन लोगों के जीवन में चयन समिति के व्यवहार के कारण इन लोगों ने
भी बीच में ही क्रिकेट से सन्यास लेना बेहतर समझा। राजनीति में क्रिकेट बोर्ड भारतीय पीछे नहीं है परंतु क्रिकेट बोर्ड के अध्यक्ष सौरभ गांगुली को पहल करनी चाहिये। धोनी जैसे महान लोगों के मन में एक जो क्रिकेट देखने की रूचि रही है उसमें थोड़ी ईमानदारी बनाये रखे। धोनी का सम्मान के साथ विदाई दे इस तरह करना ठीक नहीं वैसे लोगों के मन में पहले जैसी भावना क्रिकेट से हट गयी है। जो पहले सड़के सन्नाटे में मैच के दौरान हो जाती थी। धीरे-धीरे क्रिकेट बोर्ड ने यही रवैया रखा तो सिर्फ चुने लोग ही मैच देखने वाले बचेंगे क्योंकि वह समझ लेंगे यहां भी हर खिलाड़ी एवं गेद पूर्व से फिक्स होती है।
महेन्द्र सिंह धोनी ने एक छोटे से शहर से निकलकर एक बहुत बड़ी कामयाबी तक पहुंचे उसका नाम है महेन्द्र सिंह धोनी रेलवे की नौकरी से सफर शुरू करने वाला व्यक्ति एक महान क्रिकेटर बना वर्ष 2004-2005 में उन्हें बंगलादेश की टीम शामिल किया गया उसके बाद अपने ताबड़तोड़ रनों एवं क्रिकेट खेल से सबका मन मोह लिया सब धोनी-धोनी मन में बस गये बच्चे भी कहते सुना गया पापा धोनी अंकल है क्या यह स्वयं मैंने क्रिकेट देखते समय सुना बहुत से रिकार्ड महेन्द्र सिंह धोनी के नाम है इस तरह क्रिकेट बोर्ड को अनदेखी नहीं करनी चाहिये।

सीएए पर राजनीति

आज जिस तरह भारत के कुछ राज्यों में सीएए पर राजनीति की जा रही है जिसमें केरल, तेलांगना एवं दिल्ली में कुछ अधिक है जैसे दिल्ली में रोड जाम किए लोग एक माह से बैठे है कुछ क्षेत्रों में वह सब पत्थर गैंग जो काश्मीर में पांच सौ रूपये देकर सेना पर मरवाते थे वहीं आज पांच सौ रूपये पर किराये के टट्टू लाकर धरने पर बैठे है जिसमें महिला अधिक है। 
जो छोटे-छोटे बच्चों को लेकर धरे पर बैठी है रोड जाम में जबकि वह सब एक नौकरी का जरिया बना लिया है धरने पर छोटे-छोटे बच्चों को लेकर एक सबकी सिफ्ट तय कर दी गयी है किसे किस समय पर बैठना है जबकि सीएए पर जानकारी कुछ नहीं है सीएए है क्या? बहुत से लोगों को पता नहीं आप एवं देश के नेता समझ ले वह दिन दूर नहीं जिनको सीएस के विरोध मेमं तैयार कर एक  देश का माहौल खराब कर भड़काने का काम कर रहे है वह दिन दूर नहीं अगर यही हाल रहा तो यही जिन्हें सह दे रहे भड़का रहे यही आपको सही जगह पहुंचायेंगे तब समझ सकोगे। क्योंकि इतिहास गवाह है जब जब युद्ध हुआ है अपने में ही जपचन्द होते है जो उसके पतन का कारण बनते है। सीएस पर यह धरना प्रदर्शन करना इन लोगों का सिद्ध करता यह भारत को मजबूत एवं हितैशी नहीं है इनकी सोच पाकिस्तान अफगानिस्तान, बंगलादेशियों के लिए है। न कि भारत के लिए आज सरकार को चाहिये इन पर कार्यवाही करें जो लोग सरकारी तंत्र में बाधक है। केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने टीबी चैल में साफ कहा सीएस पर जानकारी का अभाव है लोगों को क्या है इसे जाने कउआ कान ले गया और दौड़ने लगे पहले अपना कान भी देखो एक गर्वनर राज्य का कह रहे तब भी जनता समझ नहीं पा रही है। समझे भी कैसे क्योंकि उजड़ी पार्टियों का मूर्ख जनता को बनाने का एक मुद्दा मिल गया जबकि मुद्दा बिल्कुल बेकार चन्द्र समय का है जनता जब समझने लगेगी तब इनकी सामत आयेगी अभी ओवेसी जैसे नेता एवं विपक्षी दल सब अपनी राजनीति को थोडी हवा पाने का काम कर रहे जो बिल्कुल बेकार हो गयी थी। केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने राज्य सरकार केरल से कहां आप बिना राज्यपाल को संज्ञान में लिए सीएस के खिलाफ का सुप्रीम कोर्ट चले गये है जब यह सरकारों की तानाशाही ही कहीं जा सकती है जिस पर राज्यपाल महोदय द्वारा गलत कहां गया है। जबकि सीएस पर कानून बन गया इस पर महारी जानकारी में देश की सर्वोच्च न्यायालय इस पर कोई फैसला नहीं देगी।

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