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देश की पहली शिक्षिका थीं सावित्री बाई फूले

जन अधिकार पार्टी महिला प्रकोष्ठ ने धूमधाम से मनाई जयंती 

बदौसा, कृपाशंकर दुबे । जन अधिकार पार्टी महिला प्रकोष्ठ नें क्रांति ज्योति माता सावित्री बाई फूले की 189 जयंती धूमधाम से मनाया। वक्ताओं ने कहा सावित्री बाई फूले देश की पहली शिक्षिका है जिन्होंने नरी शिक्षा, कुरीतियों पिछड़ो, दलितों और महिलाओं, कन्या शिशु हत्याओं पर जीवन पर्यंत कार्य किया, इनके वास्तविकता के रास्ते पर चलने का संकल्प लिया। 
शुक्रवार को यहां आयोजित राष्ट्रमाता सावित्री बाई फुले की 189वीं जयन्ती के अवसर पर मंजू मौर्या प्रदेश अध्यक्ष ने कहा महाराष्ट्र के सतारा जिले के नायगांव में खण्डोजी नेवसे की पुत्री सावित्री बाई का जन्म 3 जनवरी 1831 को हुआ। वर्ष 1840 में नौ वर्ष की आयु में ही उनका विवाह बारह वर्ष के ज्योतिबा फूले से हुआ। शादी के बाद वह अपने पति महात्मा ज्योतिबा से पढ़ लिख कर देश की प्रथम शिक्षिका होने का गौरव प्राप्त किया। कुरीति को तोड़ने के लिए महात्मा ज्योतिबा राव और सावित्री बाई ने सन् 1848 में लड़कियों के लिए एक विद्यालय की
क्रांति ज्योति माता सावित्री बाई फूले की जयंती मनाती जन अधिकार पार्टी महिला प्रकोष्ठ के सदस्य
स्थापना की। यह भारत में लड़कियों के लिए खुलने वाला पहला बालिका विद्यालय था। इस कार्य में शेख फातिमा ने उनका पूरा साथ दिया। अपने जीवनकाल में पुणे में ही उन्होंने 18 महिला विद्यालय खोले। उमा कुशवाहा प्रदेश उपाध्यक्ष ने बताया सावित्रीबाई फुले कहती करती थी खाली मत बैठो, जाओ शिक्षा प्राप्त करो, सचमुच जहां आज भी हम जेण्डर समानता के लिए संघर्ष कर रहे हैं। वहीं अंग्रेजों के जमाने में सावित्री बाई फुले ने पिछड़ा वर्ग की महिला होते हुए हिन्दू समाज में व्याप्त कुरीतियों के खिलाफ जो संघर्ष किया वह अभूतपूर्व और बेहद प्रेरणादायक है। ऐसी महान आत्मा को शत-शत नमन है। सावित्री बाई फूले को लड़कियों को पढ़ाने के लिए उन्होंने न केवल लोगों की गालियां सहीं अपितु लोगों द्वारा फेंके जाने वाले पत्थरों की मार तक झेली। स्कूल जाते समय धर्म के ठेकेदार व स्त्री शिक्षा के विरोधी सावित्रीबाई फूले पर कूड़ा-करकट, कीचड़ व गोबर फेंक देते थे। इससे उनके कपड़े गंदे हो जाते थे, वो अपने साथ एक दूसरी साड़ी ले कर जाती थीं जिसे स्कूल में जा कर बदल लेती। इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी, स्त्री शिक्षा, समाजोद्धार व समाजोत्थान का कार्य जारी रखा। हेमलता कुशवाहा बुंदेलखण्ड प्रभारी ने कहा कि भारत में विधवाओं की दुर्दशा को देखते हुए उन्होंने विधवा पुनर्विवाह की भी शुरुआत की और 1854 में विधवाओं के लिए आश्रम भी बनाया, साथ ही उन्होंने कन्या शिशु हत्या रोकने के लिए नवजात शिशु आश्रम खोला। 
सरोज सिंह उपाध्यक्ष ने बताया कि सावित्रीबाई फूले ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। 1854 ज्योतिबा फूले और सावित्रीबाई फूले ने एक अनाथ-आश्रम खोला। यह भारत में किसी व्यक्ति द्वारा खोला गया पहला अनाथ-आश्रम था। साथ ही अनचाही गर्भावस्था की वजह से होने वाली शिशु हत्या को रोकने के लिए उन्होंने बालहत्या प्रतिबंधक गृह की स्थापना किया। 28 नवम्बर 1890 को महात्मा ज्योतिबा फुले की मृत्यु के बाद उनके अनुयायियों के साथ ही सावित्रीबाई फूले ने भी सत्य शोधक समाज को दूर-दूर तक पहुंचाने, अपने पति महात्मा ज्योतिबा फूले के अधूरे कार्यों को पूरा करने व समाज सेवा का कार्य जारी रखा। इस मौके पर सैकड़ों महिलाओं नें बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया।

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