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Monday, December 9, 2019

हिंदु-मुस्लिम एकता कमेटी ने निकाला पीर साहब की शान में जूलूस

बड़े पीर साहब की मज़ार -बगदाद (ईरान) 
कानपुर (संवाददाता - राकेश सिंह) - बड़े पीर साहब की शान में, हिंदु-मुस्लिम एकता कमेटी के संस्थापक  सूफ़ी सन्त हज़रत मोहम्मद अहमद हुसैन के नेतृत्व मे, बाबूपुरवा से बाकरगंज, किदवई नगर बाज़ार होते हुए, आस-पास के क्षेत्र में, जूलूस निकाला गया |

अपने सूफ़ियाना अन्दाज़ व गरीबों के लिए हर पल दुआओ से दुख दूर करने के लिए  मशहूर सूफ़ी बाबा हर साल हिंदू - मुस्लिम भाइयों के साथ मिलकर बड़े पीर साहब के नाम से जूलूस का आयोजन करते हैं |
जिसमें कि सभी जाति - धर्म सम्प्रदाय के लोगों का सहयोग व साथ मिलता है |
सूफ़ी बाबा हजरत मुहम्मद अहमद हुसैन ने बताया कि - बड़े पीर साहब सभी के लिए है | उनके लिए सभी एक बराबर थे, वह सिर्फ मुहब्बत व अमन चैन के समर्थक थे|
बड़े पीर साहब जी का सम्बन्ध हज़रत मोहम्मद  पैगम्बर साहब जी के घराने से है, जैसा कि सभी जानते हैं कि - हज़रत साहब, दीन दुखियो के हक व अमन चैन का पैगाम लेकर आये थे, और सभी को खुदा की बन्दगी की ओर बढ़ातेे हुए, एक मुकम्मल इन्सान बनने की तहज़ीब दी | बड़े पीर साहब जी ने पैगम्बर हज़रत साहब जी के अमन और एकता की तहज़ीब को अपनी ज़िन्दगी का मक़सद बनाकर, उनके एक-एक पैगाम को लोगों तक पहुंचाने का काम किया| बड़े पीर साहब ने मुहम्मद साहब जी के नक्शे कदम पर चलकर दुनिया में उनकी अमन मुहब्बत  की आवाज़ को और  बुलन्द किया | 
अहमद बाबा ने बताया कि -  ग्यारहवीं का महीना गौसुल आजम शेख अब्दुल कादिर जिलानी बड़े पीर साहब के नाम से जाना-पहचाना जाता है। रवायतों के मुताबिक बड़े पीर साहब ने अपने जमाने में पैगंबरे इस्लाम के नाम पर ग्यारहवीं के महीने की 11 तारीख को नजरो नियाज कराई थी। लिहाजा अब बड़े पीर साहब के मानने ग्यारहवीं का महीना गौसुल आजम शेख अब्दुल कादिर जिलानी बड़े पीर साहब के नाम से जाना-पहचाना जाता है। रवायतों के मुताबिक बड़े पीर साहब ने अपने जमाने में पैगंबरे इस्लाम के नाम पर ग्यारहवीं के महीने की 11 तारीख को नजरो नियाज कराई थी। लिहाजा अब बड़े पीर साहब के मानने वाले पूरी दुनिया में इस दिन बड़े पीर साहब के नाम पर बड़े पैमाने पर लंगर करते हैं। जगह-जगह पर देगें चढ़ाकर उनके नाम से लंगर किए जाते हैं। यह सिलसिला पूरे माह चलता है। खासतौर से ग्यारहवीं की 11 तारीख को लगभग सभी उनके मानने वालों के घरों पर उनके नाम की फातिहाख्वानी होती है। लोग अपनी हैसियत के मुताबिक नजरो न्याज करते हैं। लंगर करते हैं और यह सिलसिला लगभग पूरे माह चलता रहता है।

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