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बेथेल चर्च में क्रिसमस की रही धूम

सैण्टाक्लाज ने शुभकामनाओं के साथ बच्चों के बीच बांटा टाफी, चाकलेट

चित्रकूट, सुखेन्द्र अग्रहरि। क्रिसमस के अवसर पर बेथेल चर्च में हर्षोल्लास वातावरण में ईसा मसीह की प्रार्थना सभाओं का आयोजन हुआ। साथ ही बाइबिल एवं कैरल के गीत गाकर सैण्टाक्लाज ने बच्चों समेत सभी को शुभकामनायें दी। इस दौरान चर्च के पादरी रुबिन ने प्रभु यीशू के संदेशों को आत्मसात करने पर बल दिया। इस अवसर पर कई बाइबिल के जानकारों ने अपने सुझाव प्रस्तुत किये।

बुधवार को मिशन रोड स्थित बेथेल चर्च में क्रिसमस हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। चर्च के पादरी रूबिन ने बताया कि यीशू मसीह का जन्म 24 दिसम्बर की अर्द्धरात्रि के पश्चात हुआ। जिसके चलते 25 दिसम्बर को जन्मदिवस मनाया जाता है। उनकी मां मैरी एक कुंवारी लडकी थी। जिनको परमेश्वर ने अपना दूत भेजने के लिये चुना था। उन्होंने बताया कि फरिश्ता गैबरियल मैरी के पास वरदान देने आये थे जो बाइबिल में गोसपेल के नाम से जाने जाते हैं। उस फरिश्ते ने मैरी को हुक्म दिया कि यीशू का वह जन्म देंगी। यीशू के जन्म के समय वहां भेंड चरवाहे मौजूद थे। अर्द्धरात्रि के बाद यीशू का जन्म हुआ। उस समय सभी चरवाहों ने खुशियां मनाई। बाइबिल में लिखा है कि जिस समय यीशू की पैदाइश होना था, उससे पहले एक फरिश्ता चरवाहे के पास आया था। यूसुफ मैरी के पति थे पर वह मिश्र चले गए। पादरी रुबिन ने बताया कि चार इसापूर्व जन्म हुआ था। जब वह 12 वर्ष के थे तो येरूशलम में कई दिन रुक कर उपदेशकों की बाते सुनते रहे। 30 वर्ष तक उसी गांव में रहकर बढई का काम किया। इसके बाद उन्होंने यहून्नाजान से दीक्षा ली। धर्मप्रचार 30 वर्ष की उम्र में यीशा ने इजरायल की जनता को यहूदी धर्म का एक नया रूप बताना शुरू किया। इंसान को क्रोध में क्षमा करना सिखाया। स्वर्ग और मुक्ति का मार्ग बताया। यीशा के 12 शिष्यों ने उनके धर्म को सभी जगह फैलाया जो आगे चलकर इसाई धर्म कहलाया।

क्रिसमस के दिन बेथेले चर्च को आकर्षक विद्युत झालरों व लाइटिंग से सजाया गया था। क्रिसमस ट्री की भव्य सजावट देख बच्चे रोमांचित हुये। चर्च में यीशू मसीह के जन्म स्थान को भेड़ों के चरवाहों की झांकियां दर्शायी गई थी। रात्रिकालीन सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किये गए। इस मौके पर सैण्टाक्लाज ने बच्चों समेत सभी को टाफी, चाकलेट, मिष्ठान वितरित कर क्रिसमस की शुभकामनायें दी। इस अवसर पर इसाई, मुस्लिम व हिन्दू समाज के लोगों की सहभागिता रही।

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