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स्कूलों में बच्चों की पहुंच में हो पुस्तकें: प्रमोद दीक्षित

अतर्रा, कृपाशंकर दुबे । आज समाज जीवन में पढ़ने के संस्कृति का घोर अभाव चारों तरफ दिखाई पड़ता है क्योंकि पाठ्य पुस्तकों से इतर साहित्य की पुस्तकें पढ़ने और उन पर विचार विमर्श करने के अवसर बच्चों को ना तो विद्यालयों में उपलब्ध हो रहा और ना ही घर परिवार में। विद्यालयों में स्थित पुस्तकालयों की पुस्तकें बच्चों की पहुंच में हों जिन्हें वे छू सकें, पन्ने पलट सके और  उनके साथ समय बिता सकें। इस तरह से बच्चों में पढ़ने के प्रति रुचि जागृत होगी और समाज में एक पठन संस्कृति का विकास होगा जो बच्चों को एक बेहतर नागरिक के निर्माण में सहायक होगा।
अनावरण के दौरान पुरस्तक दिखाते लोग 
यह विचार शिक्षक साहित्यकार प्रमोद दीक्षित मलय ने प्राथमिक विद्यालय पचोखर दो में आयोजित शैक्षिक संवाद मंच की मासिक बैठक में महेश पुनेठा लिखित पुस्तक शिक्षा के सवाल पर हो रहे विमर्श के दौरान व्यक्त किये। आगे कहा कि अभिभावकों को चाहिए के जन्मदिन और त्योहारों के अवसर पर बच्चों को खिलौने, मिठाइयों के साथ-साथ पुस्तकें भी उपहार में दें। शिक्षकों को भी विद्यालयों में बच्चों के साथ पुस्तकों पर चर्चा करनी चाहिए और पुस्तकालयों की जिम्मेदारी बच्चों की एक टोली को देकर के पठन संस्कृति को बढ़ाना चाहिए । इस अवसर पर इंद्रवीर सिंह ने कहा की पढ़ने की आदत बाल्यावस्था से ही पड़ती है लेकिन स्कूली शिक्षा में अंको की दौड़ है और परीक्षा पास करना ही उद्देश्य बन गया है। रामकिशोर पांडेय ने कहा कि प्रत्येक परिवार में एक लघु पुस्तकालय बनाना आवश्यक है साथ ही अभिभावकों को भी प्रतिदिन पढ़ना चाहिए ताकि बच्चे उन्हें देखें और पढ़ने को अपने जीवन से जोड़ सकें।  वही राजेश तिवारी और पवन पटेल ने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि आज बच्चों में प्रतियोगिता परीक्षाओं में सफल होने का बहुत दबाव है और वह पाठ्य पुस्तकें ही पढ़ते रहते हैं और केवल सूचनाओं का भंडारण ही होता है।  अनुपम अवस्थी ने अपने स्कूल के अनुभव साझा करते हुए कहा कि पुस्तकों के फटने के डर से शिक्षक बच्चों तक किताबें नहीं पहुंचने देते इसलिए जरूरी है के डर से मुक्ति पाकर किताबें बच्चों के हाथों तक पहुंचे । इस बैठक में शिक्षा के सवाल पुस्तक पर सभी वक्ताओं ने कहा के महेश पुनेठा ने जिन सवालों को उभारा है वह शिक्षा के वर्तमान परिदृश्य में आई विसंगति और गिरावट को रेखांकित करते हैं। शिक्षा के सवाल पुस्तक प्रत्येक शिक्षक, शैक्षिक प्रशासक और अभिभावकों को पढ़नी चाहिए ताकि उठाए गए सवालों के समाधान खोजे जा सके और उन रास्तों पर चलकर शिक्षा व्यवस्था को व्यवस्थित किया जाए जो बेहतर नागरिक का निर्माण कर सकें। बैठक में अरविन्द द्विवेदी, राजेश गुप्ता ने भी अपनी बात रखी। इसके साथ ही विद्यालय के विकास पर भी चर्चा हुई जिसमें सभी बच्चों को स्कूल से जोड़ने, समुदाय के साथ आत्मीयता का व्यवहार करने पर बल दिया गया। साथ ही स्कूल शिक्षा पत्रिका का लोकार्पण भी किया गया। ग्रामवासी आत्माराम त्रिपाठी की ओर से सभी को चाय जलपान कराया गया। ग्राम प्रधान लवकुश त्रिपाठी ने सभी का आभार व्यक्त तकते गुए कहा कि गांव में ऐसे आयोजन से हम गौरवान्वित हैं ।

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