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Tuesday, December 10, 2019

इतिहास के गर्भ में दफन प्राचीन शिवालय मंदिर के अनेकों रहस्य


  • पाताली हनुमान का जाज्वल विग्रह देता विजय का वरदान
  • यहां के संत जानते थे स्वर्ण बनाने की रसायन विद्या
  • प्राचीन हवेली की अकूत दौलत की रक्षा करती योगिनी


उरई (जालौन)। शिवालय मंदिर जगम्मनपुर में हजारों वर्षों से ऐसे अनेक रहस्य दफन हैं जिन पर विश्वास कर पाना भी असंभव प्रतीत होता है। जनपद जालौन का पंचनद  क्षेत्र वैसे तो सदियों पुराना धार्मिक, पौराणिक, ऐतिहासिक घटनाओं का साक्षी एवं साधु संतों की साधना तपस्या का केंद्र रहा है।



इतिहास की कड़ियां जोड़ने पर जो टूटा फूटा इतिहास सृजित हो पाता है उसमें लगता है कि अभी यहां के बारे में बहुत कुछ जान पाना बाकी है। इसी क्रम में वर्तमान में जगम्मनपुर गांव के बाहर उत्तर में प्राचीन शिवालय नामक विशाल मंदिर एवं आश्रम है जिस का प्राचीन इतिहास विस्मयकारी एवं मौजूद अवशेषों के आधार पर अति विश्वसनीय है। यह मंदिर नाम से ही भगवान शिव का स्थान जाना जा सकता है। यहां 3 मंदिर हैं जिसमें मध्य का विशाल मंदिर भगवान शिव का सिद्ध विग्रह है। श्वेत शिवलिंग विग्रह जिसके बारे में कहा जाता है बहुत प्रयास करने पर भी कोई गृहस्थ लगातार 108 सोमवार यहां पूजन नहीं कर सकता। यदि कोई यहां लगातार 108 सोमवार शिवार्चन एवं अभिषेक कर ले तो बहुत कुछ अद्भुत हो सकता है। 

पाताली हनुमान का प्राचीन मंदिर

शिव मंदिर की बांयी ओर पाताली हनुमान जी का मंदिर है जिसमें हनुमान जी के हाथ में गदा के स्थान पर तलवार है जो हनुमान जी को विभिन्न रूपों से सबसे अधिक रौद्र रूप माना जाता है । भगवान राम और लक्ष्मण को पाताल लोक का स्वामी अहिरावण हरण कर ले गया तब हनुमान ने रौद्र रूप धारण कर तलवार से देवी के सामने उसी की बलि दे दी थी। हनुमान जी के इस स्वरूप की उपासना कर पाना अत्यंत कठिन एवं बगैर पद्धति के करना खतरनाक होता है। यहां आश्रम में यदि किसी ने कुछ भी गलत करने का विचार किया उसे उसका परिणाम तत्काल मिला है। इसी मंदिर के सामने भगवान शिव के 2 संयुक्त विग्रह अलग अलग रंग सफेद एवं काले रंग के एक ही अरघा में स्थापित हैं जिनका रहस्य आज तक कोई नहीं जान पाया।

सिद्ध गणेश मंदिर में पूजा करने से होती मनोकामना पूरी 

तीसरा मंदिर देव पूजित एवं शुभ कार्यों में प्रथम पूज्य भगवान गणेश जी का है सदियों पुरानी स्थापित मूर्ति है स्थानीय लोग सिद्ध गणेश के नाम से पुकारते हैं। ऐसी मान्यता है कि पांच बुधवार यहां विधि विधान से गणेश पूजन करने पर मनोकामना पूर्ण होती है। उक्त तीनों मंदिरों के नीचे एक प्राचीन सुदृण गुफा है आज भी उपयोग की जाती है। इस आश्रम में रहने वाले साधू संत इसी गुफा में रहकर साधना व तपस्या किया करते थे ।

प्राचीन हवेली के खंडहर के बीच अवशेष आज भी जिंदा

इन तीनों मंदिरों के सामने प्राचीन हवेली के खंडहर मौजूद हैं जिसमें दो कमरे एवं एक बरामदा एवं खूबसूरत सुंदर बालकनी आज भी सुरक्षित है। जिसमें आज भी साधु-संतों को आश्रय मिलता है। बताया जाता है कि यह मंदिर एवं हवेली वर्तमान ग्राम जगम्मनपुर के स्थापित होने के बहुत पहले की है। मान्यता है कि वर्तमान में जहां आज जगम्मनपुर गांव आबाद है वहां कभी भयानक जंगल हुआ करता था। समीप के हमीरपुरा एवं रतनपुरा बड़ी आबादी के गांव थे। जंगल के बीच साधु संत आश्रम बनाकर रहते थे इन्हीं साधुओं में बब्बरपुरी नामक एक साधू रसायन विद्या के जानकार थे जो तांबा, जस्ता व कई प्रकार के रसायन निश्चित मात्रा में मिलाकर रासायनिक क्रिया के द्वारा सोना बनाने की विधि जानते थे। इसी विद्या के चलते उन्होंने आवश्यकतानुसार सोना निर्मित कर वर्तमान तीनों मंदिरों का निर्माण कराया तथा साधु-संतों के कहने के लिए विशाल भवन जिसे हवेली कहा जाता है का निर्माण कराया। इसी परंपरा के एक अन्य संत जगदीशपुरी हुए उन्होंने भी एक हवेली का निर्माण कराया जो आज पन्ना की हवेली के रूप में जानी जाती है ।मुगल काल के बर्ष 1563 में जब जगम्मनपुर गांव बसा कर आबाद किया गया। बर्ष 1789 में जगम्मनपुर राज्य के तत्कालीन राजा रतन शाह ने आर्थिक तंगी से जूझ रहे अपने राज्य को उबारने के लिए संत जगदीश पुरी जो रसायन विद्या के जानकार थे उनसे राज्य के लिए सोना बनाने के लिए कहा इस प्रस्ताव को संत जगदीश पुरी ने अस्वीकार कर दिया इस पर राजा ने कुपित होकर उन्हें राज्य से चले जाने को कहा तथा उनकी हवेली पर अपना अधिकार कर लिया। बाद में उन्हीं के वंशज राजा लोकेंद्र शाह ने पन्ना नामक नृतकी को वह हवेली रहने के लिए दे दी। यह दोनों हवेलियां ग्राम जगम्मनपुर के आबाद होने के पूर्व की निर्मित होने के कारण पुरातत्व की दृष्टि से महत्वपूर्ण है । 

प्राचीन खंडहरों में आज भी दफन है अकूत खजाना 

मान्यता है कि शिवालय के सामने प्राचीन हवेली के खंडहरों में अकूत संपदा है जिस पर योगिनी अदृश्य शक्तियों का पहरा है यदि कोई धन के लालच में खुदाई का कार्य करता है तो उसका अनिष्ट होने लगता है इस कारण आज तक स्थान पर कोई भी धन प्राप्ति का प्रयास नहीं करता है यदि कोई सेवाभाव से यहां कार्य करता है तो उसे किसी न किसी रूप में उसकी मजदूरी प्राप्त हो जाती है।

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