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Thursday, December 12, 2019

महाशचण्डी यज्ञ में आयोजित हुआ रामलीला कार्यक्रम

परशुराम संवाद में श्रोताओं की उमड़ी भीड़ इचौली में 

मौदहा(हमीरपुर) हरीशंकर गुप्ता - मौदहा क्षेत्र के कस्बा इचौली में चल रहे 25वें शतचण्डी महायज्ञ के अंतिम दिन की रामलीला में आजश्रीराम-लक्ष्मण और  परशुराम-संवाद 

सीता जी के स्वयंवर मे जब श्री राम ने शिव धनुष तोड़ा  तो ,
शिवजी के धनुष को टूटा देख कर  परशुराम प्रकट हुये और चिल्ला कर बोले –
        सुनो, जिसने शिवजी के धनुष को तोड़ा है, वह मेरा शत्रु है,
         वह  सामने आ जाए, नहीं तो सभी राजा मारे जाएँगे।
मुनि के वचन सुनकर लक्ष्मणजी मुस्कुराए और बोले

,,,बहु धनुहीं तोरीं लरिकाईं। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं॥
एहि धनु पर ममता केहि हेतू। सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू॥

 हे परशुराम जी , बचपन में  हमने बहुत से  धनुष तोड़ डाले  किन्तु आपने ऐसा क्रोध कभी नहीं     किया, इसी धनुष के टूटने पर आप इतना गुस्सा क्यों कर रहे हैं ?
परशुराम :  हे  बालक, सारे संसार में विख्यात शिवजी का यह धनुष क्या कोई छोटा मोटा धनुष समझा है।
लक्ष्मणजी ने हँसकर कहा-  हे देव! , हमारे समझ में तो सभी धनुष एक से ही हैं। फिर यह तो छूते ही टूट गया, इसमें रघुनाथजी का भी कोई दोष नहीं है। मुनि! आप तो बिना ही बात  क्रोध कर रहे  हैं?
परशुरामजी अपने फरसे की ओर देखकर बोले-
अरे दुष्ट! तू मुझे नहीं जानता, मैं तुझे बालक जानकर नहीं मार रहा  हूँ। अरे मूर्ख! क्या तू मुझे निरा मुनि ही समझता है तूने मेरा गुस्सा नहीं देखा है जिसके लिए मैं विश्वभर में विख्यात हूँ । अपनी भुजाओं के बल से मैंने पृथ्वी को राजाओं से रहित कर दिया , सहस्रबाहु की भुजाओं को काटने वाले मेरे इस भयानक फरसे को देख और चुप बैठ।  
लक्ष्मणजी हँसकर बोले- अहो, मुनीश्वर तो अपने को बड़ा भारी योद्धा समझते हो , बार-बार मुझे कुल्हाड़ी दिखाते हो , फूँक मारके पहाड़ उड़ाना चाहते हो । मैं तो आपको संत ज्ञानी समझकर आपकी इज्ज़त कर रहा है बोले-
हे विश्वामित्र! सुनो, यह बालक बड़ा उद्दण्ड, मूर्ख  है,अभी एक मिनट में मेरे हाथों मारा जाएगा ,  यदि तुम इसे बचाना चाहते हो तो इसे समझा लो वरना बाद में  मुझे दोष मत देना ।
लक्ष्मणजी ने कहा- —हे मुनि! आप अपनी शूरवीरताअनेकों बार बखान चुके हैं असली शूरवीर डींग नहीं  मारा करते । बार बार ‘मार  दूंगा’ कहकर मुझे डराए मत ।
लक्ष्मणजी के कटु वचन सुनते ही परशुरामजी ने अपने  फरसे को  संभाला और बोले-
लोगों अब मुझे दोष न दें। यह कडुआ बोलने वाला बालक मारे जाने के ही योग्य है। इसे बालक देखकर मैंने बहुत सोचा  पर अब यह सचमुच मरने को उतारू हो रहा है ।
विश्वामित्रजी ने कहा-   आप तो  महा ज्ञानी हैं ,यह  नादान बालक है इसका  अपराध क्षमा कीजिए।
परशुरामजी बोले—-    यह गुरुद्रोही और अपराधी मेरे सामने उत्तर दे रहा है। फिर भी  केवल तुम्हारी वजह  से मैं इसे बिना मारे छोड़ रहा हूँ  विश्वामित्र! । नहीं तो इसे फरसे से काटकर अभी तक इसका काम तमाम कर चुका होता ।
विश्वामित्रजी ने मन ही मन सोचा –   परशुराम जी ,  राम-लक्ष्मण को भी साधारण राजकुमार ही समझ रहे हैं।
लक्ष्मणजी ने कहा–
परशुरामजी ,आपको कभी रणधीर बलवान्‌ वीर नहीं टकरे  हैं,  इसीलिए आप घर में ही शेर हैं ।
तब श्री रघुनाथजी ने इशारे से लक्ष्मणजी को रोक दिया ।
लक्ष्मणजी के कटाक्षों  से, परशुरामजी के गुस्से को बढ़ते देखकर श्री रामचंद्रजी बोले –
परशुराम जी  !  लक्ष्मण तो नादान बालक है यदि यह आपका कुछ भी प्रभाव जानता, तो क्या यह बेसमझ आपकी बराबरी करता , आप  तो गुरु समान है , उसे माफ कर दें ।
श्री रामचंद्रजी के वचन सुनकर वे कुछ ठंडे पड़े। इतने में लक्ष्मणजी कुछ कहकर फिर मुस्कुरा दिए। उनको हँसते देखकर परशुरामजी फिर उबल पड़े ।
परशुराम जी  कहा-   
 हे राम! तेरा भाई बड़ा नालायक है,यह देखने में तो बड़ा भोला लगता है पर स्वभाव से  टेढ़ा है, वो तो तेरी बात भी नहीं मानता , इसके दिल में सामने खड़ी मौत का भी खौफ नहीं है ।
लक्ष्मणजी ने हँसकर कहा- हे मुनि! सुनिए, अब क्रोध त्याग दीजिए। टूटा हुआ धनुष क्रोध करने से जुड़ नहीं जाएगा। खड़े-खड़े पैर दुःखने लगे होंगे, बैठ जाइए ।  यदि यह धनुष आपको इतना ही प्रिय था  तो किसी बड़े कारीगर को बुलाकर जुड़वा देते हैं ।

 लक्ष्मणजी के बोलने से जनकजी डर जाते हैं और कहते हैं-
लक्ष्मण जी , बस, चुप रहिए, अनुचित बोलना अच्छा नहीं।
जनकपुर के स्त्री-पुरुष थर-थर काँप रहे हैं और मन ही मन प्रार्थना कर  रहे हैं कि बात ज्यादा आगे न बढ़े ।
श्री रामचन्द्रजी पर एहसान जताकर  परशुरामजी बोले-
तेरा छोटा भाई समझकर मैं इसे छोड़ रहा हूँ।
यह सुनकर लक्ष्मणजी फिर हँसे। तब श्री रामचन्द्रजी ने तिरछी नजर से उनकी ओर देखा, जिससे लक्ष्मणजी सकुचाकर, विपरीत बोलना छोड़कर, गुरुजी के पास चले गए
श्री रामचन्द्रजी दोनों हाथ जोड़कर अत्यन्त विनय के साथ बोले-
परशुरामजी,  आपका वीरों का सा वेष देखकर ही बालक ने कुछ कह डाला था, वास्तव में उसका भी कोई दोष नहीं है, आपको फरसा , बाण और धनुष धारण किए देखकर और वीर समझकर बालक को क्रोध आ गया। वह

आपका नाम तो जानता था, पर उसने आपको पहचाना नहीं। अपने रघुवंश के स्वभाव के अनुसार उसने उत्तर दिया  ।  आप मुनि की तरह आते, तो बालक आपके चरणों की धूलि सिर पर रखता। अनजाने की भूल को क्षमा कर दीजिए। लक्ष्मण ने तो धनुष नहीं तोड़ा ,धनुष तो मैंने तोड़ा है इस मौके पर कांग्रेस के प्रदेश सचिव हरदीपक निषाद,क्षेत्र पंचायत सदस्य सौरभ मिश्र, श्यामबाबू गुप्ता,नयन कुमार अनुरागी ,राम जी शिवहरे, रामपाल साहू प्रधान,रामौतार प्रजापति, हर्षराज सिंह,सन्तोष सिंह,अशोक शुक्ला, हैंया महाराज, आदि उपस्थित रहे ।

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