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कथारूपी अमृत को पीने से जीवन होता है धन्य

रेलवे स्टेशन में चल रहे रामचरित मानस सम्मेलन का तीसरा दिन

बांदा, कृपाशंकर दुबे । शहर के रेलवे स्टेशन में चल रहे रामचरित मानस सम्मेलन के तीसरे दिन हनुमान गढ़ी अयोध्या से पधारे संत रमेशदास नागा ने श्रोताओं को श्रीराम की कथा का श्रवण कराते हुये कहा कि राम ब्रम्ह है, परमार्थ के स्वरूप है, संसार में श्रीराम धर्म की रक्षा के लिये आये है। संसार का हित करने के लिये आये है। आसुरी शक्तियों का विनास करने के लिये आये है। उन्होने कहा कि भगवान श्रीराम आयोध्या में राज्य करने के लिये नही आये है, लोगों का कल्याण करने के लिये आये है। उन्होने कहा कि पृथ्वी में जब जब धर्म की हानि होती है, तब तब भगवान इस पृथ्वी पर अवतार लेते है। भगवान की कथारूपी अमृत को जिसने पिया उसका जीवन धन्य हो जाता है।
रामचरित मानस सम्मेलन को संबोधित करते संत रमेशदास नागा 
इसी क्रम में रूरा कानपुर से कथा व्यास देवी प्रसाद ने राजा दशरथ और कैकेई के विवाह का वृतान्त सुनाते हुये कैकेई की दासी मंथरा को तर्कशास्त्र की आर्य बताया और कहा कि मंथरा साधारण महिला नही थी। वह स्वरूपा थी। उसमें इतनी शक्ति थी कि असफलता को सफलता की ओर ले जाने की क्षमता थी। उन्होने जब तक मंथरा दासी थी, तब तक आयोध्या में सुख एवं प्रसन्नता थी। जब वह मंत्राणी बन गयी, वहीं से अयोध्या में विनास शुरू हो गया। राम के वनवास की मुख्य भूमिका मंथरा ने निभाई थी। कानपुर झीझक से आये वक्ता आलोक मिश्र ने धर्म और स्नेह की चर्चा करते हुये भगवान श्रीराम के वन गमन और माता कौशिल्या के हृदय भाव की कहानी बताते

हुये कहा कि राजरानी कौशिल्या के सामने एक ओर धर्म है और दूसरी ओर वात्सल्य प्रेम है। इस समय कौशिल्या के सामने धर्म के लिये सबसे बडी परीक्षा है। राजरानी कौशिल्या के सामने एक तरफ मांग का सिंदूर है, दूसरी तरफ वात्सल्य प्रेम है। लेकिन कौशिल्या ने धर्म को निभाते हुये भगवान श्रीराम को वन जाने के लिये कह दिया। वहीं वाराणसी से आये विद्वुषी श्रीमती नीलम शास्त्री ने भगवान श्रीराम के जन्म की कथा का श्रवण कराते हुये कहा कि राम ही हमारे सब कुछ है। श्रीराम के सानिध्य में पहुंचने से सारे कष्ट दूर हो जाते है। अंत में कामतानाथ प्रमुख द्वार के महन्त मदनगोपालदास महाराज ने भगवान श्रीराम की कथा का श्रवण कराते हुये कहा कि कामतानाथ के दर्शनार्थ देवता भी उतरकर आते है। तेतींस करोड देवता कामतानाथ के दर्शन को चित्रकूट में आाये है। कथा का संचालन अयोध्या से पधारे शशिभूषण महाराज ने किया।

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