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गोरों से लड़ना सिखा गई, रानी बन जौहर दिखा गई

हमीरपुर, महेश अवस्थी । प्राचार्य डा भवानीदीन ने कहा कि बुन्देली धरा विरांगनाओं की वसूधा रही है। जहां पर दुर्गावती, आवंतीबाई, रानीलक्ष्मीबाई जैसी महिलायें पैदा हुई हैं। बुन्देलखण्ड के झांसी के भोजला गांव में 22 नवम्बर 1930 को झलकारी बाई एक गरीब कोरी परिवार में पैदा हुई थीं। जब वह छोटी थीं तभी मां जमुना देवी का निधन हो गया। झलकारी बाई बचपन से ही गठीले शरीर की थी। वह बहादुर महिला थी। लकड़ी काटते समय हमलावर शेर को कुल्हाड़ी से मार दिया था। इसपर रानी लक्ष्मीबाई ने उन्हें अपने पास बुला लिया और


पहली महिला सेना का गठन किया। उन्हें सेनापति की जिम्मेदारी दी गई। अस्त्र-शस्त्र चलाना, घुड़सवारी करना और तलवार चलाने की जानकारी हासिल की। वे रानी लक्ष्मीबाई की हमसक्ल भी थीं। अंग्रेजों ने जब झांसी के किले को घेर लिया तो झलकारी बाई किले से घोड़े में सवार होकर निकली और अंग्रेजों से संघर्ष करती हुईं निकल गई। अंगेेजी हतप्रभ थे, मगर किसी गदद्ार ने सूचना दी कि वह रानी नहीं झलकारी है। थोड़ी देर में रानी भी निकल पड़ी और वो अंग्रेज सेना के दांत खट्टे करते हुये कालपी पहुंच गई। इधर झलकारी अंग्रेजों से लड़ती हुई शहीद हो गईं। यदि हिन्दुस्तान में एक फीसदी महिलायें ही झलकारी बाई की तरह आजादी की दीवानी हो गई तो हमें हिन्दुस्तान छोड़कर भागना पड़ेगा। ऐसा अंग्रेजों ने सोंचा। मैथलीशरण गुप्ता ने लिखा कि जाकर रण में ललकारी थी वो झांसी की झलकारी थी, गोरों से लड़ना सिखा गई, रानी बन जौहर दिखा गई। डा श्याम नारायण, डा लालता प्रसाद सहित कई वक्ताओं ने विचार रखे। संचालन रमाकान्त पाल कर रहे थे।

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