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'उम्मीद का चिराग़'

(कविता-कमलेश कमल)   
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इस बियाबां में
हताश, निराश
हम दो पथिक
श्रमशान्त
राह नहीं, रहबर नहीं
सूर्य की किरणें नहीं
होने को साँझ
फिर विकट अंधेरा
अगहन मास
कँपकँपाती ठंड


अवनि तल 
बर्फ की सी सर्द
नसें सुन्न
खाली तुम्हारा आँचल 
मेरा झोला
कुछ भी नहीं पाथेय
फिर भी जला है
सुलगा है....
उम्मीद का चिराग़
आओ इसे हवा दें!

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