"बीएचयू विवाद : अंदर की बात!" - Amja Bharat

Amja Bharat

All Media and Journalist Association

Breaking

Post Top Ad

Responsive Ads Here

Thursday, November 21, 2019

"बीएचयू विवाद : अंदर की बात!"


(आलेख- कमलेश कमल)
*******

अतिवादिता विवाद और बखेड़े को जन्म देती है पर मज़ा यह कि इसके शिकार (रोगी) को इसका पता नहीं चलता। मनोवैज्ञानिक रूप से देखें, तो अतिवादिता सीमित सीमित बुध्दि और असीमित उत्साह से उत्पन्न होती है। बीएचयू में उपजे विवाद के मूल में भी यही है।

मामला शुरू हुआ एक मुस्लिम प्रोफेसर की 'धर्म विज्ञान संकाय' में नियुक्ति से, पर जैसा कि आजकल ट्रेंड बन गया है- लोग बिना सब कुछ जाने धड़ाधड़ पक्ष या विपक्ष में हो गए। फेसबुक और व्हाट्सएप पर आधी-अधूरी जानकारी पूरे जोश से पोस्ट करने लगे।

आपने ऐसे पोस्ट पढ़े होंगे  क्या एक मुस्लिम संस्कृत नहीं पढ़ा सकता?... हद हो गई दकियानूसी सोच की! आदि! आदि!!

क्या आपने पता किया कि संस्कृत पढ़ाने का ही विरोध हो रहा है या कोई और बात भी है?

दरअसल संस्कृत-भाषा पढ़ाने को लेकर विवाद है ही नहीं। अभी आप यह मत तय कर लें कि मैं इस विवाद के पक्ष में हूँ। अभी तक बस इतनी निष्पत्ति लें कि संस्कृत एक भाषा के रूप में पढ़ाने का विरोध हो रहा है, यह कहने वाले या तो उड़ती अफ़वाह पर विज्ञान विषारद बन बैठे हैं, या फ़िर निहित एजेंडे के तहत काम करने वाले उपद्रवी हैं।

तो, विवाद संस्कृत पढ़ाने को लेकर नहीं है और न ही कला-संकाय (arts faculty) में उक्त प्राध्यापक की नियुक्ति हुई है। नियुक्ति हुई है धर्म-विज्ञान संकाय में और विवाद के मूल में छात्रों के एक गुट की यह माँग है कि हम संस्कृत विद्या में धर्म-विज्ञान की शिक्षा उनसे नहीं ले सकते, जो हमारे धर्म को मानते ही नहीं हैं। वे छात्र भी यह मानते हैं कि उक्त प्राध्यापक की नियुक्ति संस्कृत भाषा पढ़ाने के लिए कला संकाय में हो, तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं।

विरोधी गुट की तरफ़ से एक तर्क दिया जा सकता है कि वेद सनातन परंपरा की वे धरोहर हैं जिन्हें समग्रता में समझने के लिए उस जीवन शैली को जीना आवश्यक है। जो सनातन परंपरा को स्वयं मानता ही नहीं हो, वह दूसरों को क्या शिक्षा देगा।

अब इसके विपक्ष में यह कहा जा सकता है कि वे उपासना पद्धति से मुस्लिम हैं, पर जीवनशैली तो हिन्दुत्व की है। ऐसे में वे इसे पढ़ाने के अधिकारी हैं। बाक़ी 28 इतने योग्य क्यों नहीं थे कि किसी अ-हिन्दू  का चयन हुआ?

विरोधी गुट का यह भी कहना है कि यह नियुक्ति नियम विरुद्ध हुई है। अपने समर्थन में वे इस संकाय की स्थापना घोषणा के मूल अभिलेख का हवाला देते हैं जिसमें लिखा है- "धर्मशास्त्र विभाग में वेदविज्ञान, कर्मकांड के शिक्षण के लिए हिन्दू मतावलंबी की नियुक्ति हो!"

तो, आप यह नहीं कह सकते कि विरोध का कोई आधार नहीं है। अगर यह स्थापनाघोषणा में ही उल्लिखित है, तो नियुक्ति से पहले इसमें ही संशोधन कर देते।

अच्छा, सभी छात्र विरोध नहीं कर रहे हैं। विरोधी गुट का कहना है कि नियमविरुद्ध नियुक्ति हुई है, तो विरोध करना उनका अधिकार है। उनकी इस बात में दम है।

अच्छा, इस विषय को ऐसे भी देखा जा सकता है कि जब 29 अभ्यर्थियों में उक्त प्राध्यापक चुन कर आए हैं, उपासना पद्धति अलग होने के बावजूद भजन कीर्तन गाते हैं, गौसेवक परिवार से हैं, कुरान से अधिक गीता पढ़ते हैं, तो उनसे पढ़ लेने से हिंदुत्व ख़तरे में नहीं पड़ जाएगा, बल्कि यह उसकी शोभा में चार-चाँद लगाएगा। हिंदू धर्म सर्व-समावेशी है और जो इसको नहीं मानते, वे इसे नहीं जानते या पीके की भाषा में कहें, तो रॉन्ग नम्बर हैं।

मैक्समूलर, दाराशिकोह से लेकर विविध अन्य धर्मावलंबियों ने वेदों का सांगोपांग अध्ययन किया। आज भी कई कैम्ब्रिज, ऑक्सफोर्ड सहित कई विश्वविद्यालयों में विदेशी विद्वान् संस्कृत पढ़ा रहे हैं, वेदों पर रिसर्च कर रहे हैं। विरोधी गुट के तर्क को लें, तो मामला उल्टा पड़ जाएगा। यह रूढ़िवादिता रखने के दिन लद गए!

विवाद का एक तीसरा कारण भी है। जब विरोधी छात्र लामबन्द हो रहे थे, तभी यह ख़बर फ़ैली कि अगले सत्र से 'प्राचीन भारतीय इतिहास' के पाठ्यक्रम से रामायण काल और महाभारत काल जैसे खण्ड हटा दिए जाएँगे। इससे इस घटना ने साम्प्रदादिक रंग ले लिया। विश्वविद्यालय की तरफ़ से मेरी अद्यतन जानकारी में इसका खण्डन नहीं किया गया। (हो सकता है कि किया गया हो।)

बीएचयू के नाम में ही हिंदू शब्द सन्नद्ध है, तो इसका हिंदूवादी झुकाव स्वाभाविक है, जैसे कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय का मुस्लिम रुझान स्पष्ट है। दिक़्क़त वहाँ है, जहाँ बात एक हद से आगे बढ़ जाए। 

जहाँ विश्वविद्यालय प्रशासन को नियुक्ति से पूर्व ही देखना था कि किसी नियम की अवहेलना तो नहीं हो रही वहीं विरोधी छात्रों को समझना चाहिए कि इसी शुद्धतावादी दुराग्रह ने हिंदुत्व को संकुचित किया है।  

निष्कर्षत: आग्रह है कि आधी-अधूरी जानकारी पाकर अति उत्साह में न आएँ। बात की तह में जाकर पता नहीं करेंगे, विवेक से काम नहीं लेंगे तो भीड़ का हिस्सा बन भेड़ बन जाएँगे।

आपका ही,
कमल

No comments:

Post a Comment

Post Bottom Ad

Pages