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जीवन के प्रत्येक पहलू में करें परमात्मा का स्मरण: देवी प्रसाद

रेलवे स्टेशन में आयोजित मानस सम्मेलन का दूसरा दिन

बांदा, कृपाशंकर दुबे । रेलवे स्टेशन परिसर में चल रहे 42 वर्ष के पंचदिवसीय मानस सम्मेलन के दूसरे दिवस श्रोताओं को सम्बोधित करते हुये वक्ता रूरा से आए देवी प्रसाद महाराज ने कहा कि इस सम्मेलन में आये हुये श्रोता, वक्ता का परम सौभाग्य व पुण्य फल है जीवन के प्रत्येक पहलू में परमात्मा का स्मरण करना है।
उन्होने कहा कि गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है कि देखि अइ रूप नाम अधीना, रूप ज्ञान नहिं नाम विहीना, नाम ही वह साधन है जो हमे साधन तक पहुंचा सकता है। बुधि विश्राम सकल जन रंजन, रामकथा कति कलुष
मानस सम्मेलन में बोलते महाराज देवी प्रसाद 
विभंजन, राम की यह कथा विद्धानों की समाज को विश्राम प्रदान करती है। कथा का श्रवण भगवत प्राप्ति कराता है। जीव के लिसे सुखद कल्याणकारी व मंगलमयी है। कलियुग के कलुष को नाश करने वाली है। दूसरों के दोषों को दूर करने के लिये यह सत्संग है। कहा कि कथा को सुधा की तरह अमृत मानकर पान करना चाहिये। कथा को अमर कहा। नाना प्रकार के क्लेशों के शमन करने वाला ही साधु कहा जाता है। अहार, अचार, विचार, मन, नियम को जो साध लेता है वही साधु होता है।शंकराचार्य सरस्वती ने बेदों के पढने व ज्ञान प्राप्त करने की बात कही। किन्तु गोस्वामी ने जनज न की भाषा में यह ज्ञान देन वाले पांचवो बेद रामचरित मानस के रूप में रच डाला। झींझक कानपुर के रामायणी पंडित आलोक मिश्र ने कथा को लागे बढाते हुये कहा कि कौशल ने राम से
मानस सम्मेलन में बोलते महाराज देवी प्रसाद 
पूंछा बताओ तुम साक्षात परंब्रम्ह हो, राम ने कहा हां मैं वास्तव में वैसा ही हूं। जैसा आपने सोंचा, पूंछ और जानना चाहा है। मां कौशिल्या ने राम से कहा कि हे राघव ब्रम्ह से यह कह दो कि जितने दिन बिना राम को देखने मैने बितायें है उन्हे मेरी अयु में न जोडे। दशरथ गुरू वशिष्ठ से कहते है कि मैं आप कुलगुरू से आज्ञा लेने आया हूं। इन्द्रियों को वश में करने वाले को वशी कहते है। वक्ता ने कहा कि अरे कैकेई जब तेरे गोद में राम बैठते है तो तब तुम चन्द्र की भंाति हो जाती। वहीं कैकेई जब सर्विणी बनी तो वही अमृत उसके मुख में विष बन गया। वक्ता ने श्रोताओं को कहा कि मन्थरा के समझाने पर कैकेई ने दशरथ से राम की सौगंध दिलाकर वर मांगे। कहा कि किसी से कभी कुछ मांगियें, भक्ति करते समय ईश्वर से मात्र यही कहिये कि आपने जो दिया वह बहुत दिया है। पावन अवधपुरी अयोध्या से आये रमेशदास नागा महाराज ने कथा का विस्तार करते हुये समापन किया। 

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