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छुपा कर ग़म को होठों पर हंसी लाना ज़रूरी था

मिनी मुशायरे में शायरों ने अपने क़लाम से समा बांधा

बिजनौर (संजय सक्सेना) स्योहारा के मदरसा तजविदुल क़ुरआन में नशिस्त का आयोजन किया गया। हिलाल स्योहारवी के पुत्र गौहर हिलाल के इस कलाम को बार बार सुना गया..."दिल किसी से कहीं लगा ही नही, हादसा यह कभी हुआ ही नहीं।" माहिर स्योहारवी ने कुछ इस तरह अपना  कलाम पेश किया, "छुपा कर ग़म को होठों पर हंसी लाना ज़रूरी था, मुहब्बत में किसी दिन ये मक़ाम आना ज़रूरी था।" मास्टर इक़बाल राहत ने भी
यू कहा, "एक बेवा की निगाहों से कोई पूछे तो, चूड़ियां टूट कर लगती है कलाई कैसी।" मौज स्योहारवी के जहर को बहुत वाहवाही मिली, "वक़्त इंसान को जब कोई सज़ा देता है, गैर तो गैर है अपना भी दग़ा देता है।" मौलवीशाद का ये शेर बहुत पसंद किया गया, "हर बड़े का अदब ज़रूरी है, किसकी कितनी है शान मत देखो।" नशिस्त का संचालन मौलाना शुजाउद्दीन फ़लक बिजनौरी द्वारा किया गया। मौलवी मुकीम उर्रहमान, कारी वसीम, मौलवी कैफ़, मौहम्मद आज़म माहिगिर, मुंशी शाहिद, सलीम अंसारी, हाफ़िज मौहम्मद अहमद, फ़ज़ल अंसारी, ज़रीफ़ अंसारी, कारी अहमद, तंज़ीम इदरीस, इरफ़ान समीर, आदि मौजूद रहे।

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