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जेएनयू मुद्दे पर आप कहाँ खड़े हैं?


'आलेख- कमलेश कमल'


(अनुरोध- यह जेएनयू के बहुसंख्यक छात्रों के समर्थन में और हुड़दंगियों, राष्ट्रद्रोहियों के विरोध में खड़े होने का वक़्त है। यह सरकार को वाज़िब तरीके से हल निकालने हेतु कहने का वक़्त है।)

आज जेएनयू को लेकर भारतीय-समाज दो भागों में बँटा दिखता है। एक तबका जहाँ इसके महिमामंडन में लगा है और फीस वृद्धि को लेकर सरकार को कटघरे में कर रहा है, वहीं दूसरा तबका फ़ीस-वृद्धि को जायज़ बताता है। कुछ अतिवादी तो, इसे मुफ़्तख़ोरी मान इसे बंद करने की पुरज़ोर मांग कर रहे हैंI सच किसी अति में नहीं, बल्कि बीच में है। आदरपूर्वक पर ज़िम्मेदारी के साथ कहना है कि अगर आपने एक विशिष्ट रंग का चश्मा अगर पहन लिया है, तो फ़िर आपको सब कुछ वैसा ही दिखेगा। बौद्धिक रूप से समुन्नत कोई भी व्यक्ति इन दोनों में से किसी तरफ़ नहीं हो सकता। 


यह सच है कि देश को जेएनयू ने एक-से-बढ़कर-एक विद्वान दिया है, विभूतियाँ दी हैं। जेएनयू की छात्राओं को सिगरेट-चरस पीने वाली, 'भारत तेरे टुकड़े होंगे'  गैंग का समर्थन करने वाली और यहाँ तक कि चरित्रहीन कहने-मानने वालों को यह याद रखना चाहिए कि वर्तमान वित्त-मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण जी भी जेएनयू की ही देन हैं। उन्हें यह याद रखना चाहिए कि इसी वर्ष जेएनयू ने भारत को एक नोबेल प्राइज दिया है। लब्बोलुआब यह कि जेएनयू की पढ़ाई या उसकी मेधा पर सवाल नहीं उठाया जा सकता।  मुझे यह लिखने में तनिक भी आपत्ति नहीं है कि उसकी मेधा पर सवाल उठाने वाले बहुसंख्यक लोग वहां पढ़ने की अर्हक परीक्षा पास नहीं कर सकते।

लेकिन क्या इसका अर्थ यह है कि जेएनयू में सब ठीक है? बिल्कुल नहीं! जेएनयू के छात्र पर अगर औसतन सरकार 3 से 4 लाख ख़र्च करती है, तो सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उस पैसे का सदुपयोग हो!  वहाँ की पढ़ाई देश के काम आए!  देश के विरोध में काम न आए, देश के दुश्मनों के काम न आए!  यह नाक़ाबिलेबर्दाश्त है  कि जनता के टैक्स के पैसे से पढ़ रहे बच्चे इस देश की सांस्कृतिक धरोहर पर सांकेतिक चोट करें, या देश विरोधी नारे लगाएँ।

इस तथ्य से कैसे इनकार किया जा सकता है कि जब दंतेवाड़ा में सुरक्षा-बल के जवान मारे गए, तब जेएनयू में जश्न मनाया गया।  जेएनयू के कैंपस में अगर "अफजल हम शर्मिंदा हैं, तेरे कातिल जिंदा हैं", "भारत तेरे टुकड़े होंगे- इंशाल्लाह इंशाल्लाह" या "भारत की बर्बादी तक जंग रहेगी जारी" जैसे नारे लगें, तो देश की जनता को विरोध करने का हक़ है और इस मुद्दे पर विरोध को किंचित् भी गलत नहीं कहा जा सकता।

कहते हैं कि प्रतिभा अगर ग़लत दिशा में मुड़ जाए तो उत्पात मचाती है। हाल के वर्षों में ऐसा देखने को मिला है कि जेएनयू की कुछ प्रतिभाएँ नकारात्मक रूप से मुड़ जाती हैं। 'श्रीराम को सांकेतिक फाँसी',  'देवी-दुर्गा को वेश्या बताया जाना', 'महिषासुर की पूजा' आदि विकृतिमूलक बातें जब समाज के सामने आती हैं, तो समाज के ताने-बाने पर इसका बुरा प्रभाव पड़ता है। कुछ छ्द्म-बुद्धिजीवी जब इसका बचाव करते हैं, तो निश्चित ही ख़ुद को एक्सपोज करते हैं। ऐसा कर तथाकथित बुद्धिजीवी संकेत दे देते हैं कि उनकी निष्ठा बिक चुकी है।

सच यह है कि जेएनयू में पढ़ने वाला हर छात्र देशद्रोही नहीं होता। उनमें से अधिकांश सामान्य परिवार और कभी-कभी तो अत्यंत ग़रीब परिवार से आते हैं और इस देश को उतना ही प्यार करते हैं जितना कि बाक़ी लोग। 

यह सही है कि वहाँ का उन्मुक्त वातावरण भटकने का अवसर देता है, लेकिन यह भी सही है कि इस उन्मुक्त वातावरण में भी अधिकतर छात्र-छात्राएं अपनी जिंदगी संवारने के लिए दिन रात परिश्रम करते हैं, एक अदद नौकरी की जुगाड़ में लगे रहते हैं। इन छात्रों को वहाँ की राजनीति से कोई मतलब नहीं होता। हाँ, कभी-कभी उन्हें भी नेतागीरी करने वाले या हुड़दंगी छात्रों के दबाव में कुछ घंटे प्रदर्शन में शामिल होना पड़ता है। लेकिन यह भी सच है कि ऐसे प्रदर्शनों में जाना भी उन्हें वक्त की बर्बादी लगती है, लेकिन फ़िर भी वे जाते हैं।

जहाँ तक फीस वृद्धि की बात है, तो अच्छी शिक्षा मुहैया कराना सरकार का दायित्व है। फीस बढ़ने से बहुत से बच्चों को दिक़्क़त होगी जो किसी तरह नोट्स फोटोकॉपी करा पाते हैं, प्रतियोगी परीक्षा की फीस भर पाते हैं या ट्यूशन पढ़ाकर इतना कमा पाते हैं कि मोबाईल रिचार्ज कर सकें और रात को पढ़कर उठने के बाद ढाबे पर जाकर चाय पी सकें।

सरकार को यह सोचना चाहिए वहाँ ऐसे बहुत से बच्चे होंगे जिन्हें ₹300 की हॉस्टल फीस भरने में भी दिक़्क़त होगी। एक सीधा सा उपाय है कि फीस वृद्धि छात्रों की आर्थिक स्थिति को देखकर ही हो।  ग़रीबी रेखा से नीचे रह रहे परिवारों से आए बच्चों के लिए बढ़ोतरी नहीं होनी चाहिए, लेकिन अमीर परिवारों से आए बच्चों से उतनी ही फीस वसूलनी चाहिए जितनी कि अन्य राष्ट्रीय विश्वविद्यालयों में वसूली जा रही है।

सरकार यह भी सुनिश्चित करे कि भारत जैसे विकासशील देश में अनंत समय तक किसी छात्र पर उच्च शिक्षा का बोझ नहीं उठाया जा सकता, इसलिए कितने साल तक किसी छात्र या छात्रा को छूट मिलेगी यह तय हो।  इससे वे अपनी पढ़ाई पर ज्यादा ध्यान देंगे और भटकाव से बचेंगे।

हाँ, सबसे बड़ी बात है राष्ट्र विरोधी तत्त्वों पर सख़्त कार्रवाई होनी चाहिए। देश किसी पर इसलिए इतना व्यय नहीं करता कि वह राष्ट्रनायक (स्वामी विवेकानंद) का अपमान करे!

आपका ही,
कमल

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