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"जीवन का नियम" भाग -01

(आलेख-कमलेश कमल)

जीवन के नियम भी विज्ञान के कार्य-कारण-प्रभाव की तरह ही सुस्पष्ट होते हैं! इनमें एक है- आत्मजागरूकता (self awareness) के बाद ही आत्म-नियंत्रण (self-regulation) आता है।

आत्म-जागरूकता क्या है? यह वह क्षमता है जिससे आप अपने मूड, भावनाओं, इच्छाओं एवं इनके कारण तथा प्रभावों को भलीभाँति समझने लगते हैं। कब समझें कि आत्म-जागरुकता आने लगी है? जब व्यक्ति अपना वास्तविक मूल्यांकन करता दिख जाए, अपनी सीमाओं की समझ रखने लगे, तब समझिए कि व्यक्ति आत्म-जागरुक होने लगा है।

अच्छा, अब हम जिस नियम की बात कर रहे हैं उसके अनुसार 'आत्म-जागरुकता' से 'आत्म-नियंत्रण' उत्पन्न होता है। यह सम्बन्ध समझने से पूर्व हमें यह समझना होगा कि आत्म-नियंत्रण क्या है? इसकी पहचान क्या है??


आत्म-नियंत्रण है बिगड़े, विध्वंसक और अन्य नकारात्मक आवेगों (impulses) को रोके रहना, इन्हें फट पड़ने से बचाना तथा निर्णय लेने के बाद भी, मन करने के बाद भी प्रतिक्रिया को रोके रखने का सामर्थ्य।  एक उदाहरण लेते हैं- किसी ने आपको कोई चुभने वाली बात कह दी। आप उसे बहुत कुछ कह-सुना देना चाहते हैं, पर आपको लगता है कि अभी सही समय नहीं आया, या यह कहना अभी सही नहीं होगा। यह आत्म-नियंत्रण है। यह सत्य है कि प्रतिक्रिया को रोके रखना (delay reaction) से कई समस्याएँ स्वयं समाप्त हो जाती हैं। 

कैसे पता लगे कि व्यक्ति में आत्म-नियंत्रण आ गया है। पहली बात तो यह कि आत्म-जागरुकता की सभी बातें उसमें दिखेंगी और कुछ विशेष बातें भी। एक तो यह कि व्यक्ति बदलाव को आसानी से स्वीकार कर सकेगा। दूसरी बात यह कि ऐसा व्यक्ति सहज होने के कारण लोगों का विश्वासप्रिय हो जाता है। यदि आत्म-जागरुकता के पथ पर हो, पर आगे की यात्रा अभी नहीं हुई है, तो बदलाव को सहज स्वीकार करना या सहज होने जैसे गुण व्यक्ति में नहीं होंगे!

आपका ही,
कमल

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